Saturday, 27 August 2011

ज़िंदगी को मुश्किल बनानेवाले 7 अचेतन विचार


हम लोगों में से बहुत से जन अपने मन में चल रहे फालतू के या अतार्किक विचारों से परेशान रहते हैं जिसका हमारे दैनिक जीवन और कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. ये विचार सफल व्यक्ति को असफल व्यक्ति से अलग करते हैं. ये प्रेम को नफ़रत से और युद्ध को शांति से पृथक करते हैं… ये विचार सभी क्लेशों और युद्दों की जड़ हैं क्योंकि अचेतन एवं अतार्किक विचारधारा ही सभी युद्धों को जन्म देती है.
इस पोस्ट में मैं ऐसे 7 अतार्किक व अचेतन विचारों पर कुछ दृष्टि डालूँगा और आशा करता हूँ कि आपको इस विवेचन से लाभ होगा (यदि आप इनसे ग्रस्त हों, तो:)
इस पोस्ट में मैं ऐसे 7 अतार्किक व अचेतन विचारों पर कुछ दृष्टि डालूँगा और आशा करता हूँ कि आपको इस विवेचन से लाभ होगा (यदि आप इनसे ग्रस्त हों, तो:)
1. यदि कोई मेरी आलोचना कर रहा है तो मुझमें अवश्य कोई दोष होगा.
लोग एक-दूसरे की अनेक कारणों से आलोचना करते हैं. यदि कोई आपकी आलोचना कर रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपमें वाकई कोई दोष या कमी है. आलोचना का एक पक्ष यह भी हो सकता है कि आपके आलोचक आपसे कुछ भिन्न विचार रखते हों. यदि ऐसा है तो यह भी संभव है कि उनके विचार वाकई बेहतर और शानदार हों.  यह तो आपको मानना ही पड़ेगा कि बिना किसी मत-वैभिन्य के यह दुनिया बड़ी अजीब जगह बन जायेगी.
2. मुझे अपनी ख़ुशी के लिए अपने शुभचिंतकों की सुझाई राह पर चलना चाहिए.
बहुत से लोगों को जीवन में कभी-न-कभी ऐसा विचार आता है हांलांकि यह विचार तब घातक बन जाता है जब यह मन के सुप्त कोनों में जाकर अटक जाता है और विचलित करता रहता है. यह तय है कि आप हर किसी को हर समय खुश नहीं कर सकते इसलिए ऐसा करने का प्रयास करने में कोई सार नहीं है. यदि आप खुश रहते हों या खुश रहना चाहते हों तो अपने ही दिल की सुनें. दूसरों के हिसाब से ज़िंदगी जीने में कोई तुक नहीं है पर आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आपके क्रियाकलापों से किसी को कष्ट न हो. दूसरों की बातों पर ध्यान देना अच्छी बात है पर उन्हें खुश और संतुष्ट करने के लिए यदि आप हद से ज्यादा प्रयास करेंगे तो आपको ही तकलीफ होगी.
3. यदि मुझे किसी काम को कर लेने में यकीन नहीं होगा तो मैं उसे शुरू ही नहीं करूंगा.
इस विचार से भी बहुत से लोग ग्रस्त दिखते हैं. जीवन में नई चीज़ें करते रहना बढ़ने और विकसित होने का सबसे आजमाया हुआ तरीका है. इससे व्यक्ति को न केवल दूसरों के बारे में बल्कि स्वयं को भी जानने का अवसर मिलता है. हर आदमी हर काम में माहिर नहीं हो सकता पर इसका मतलब यह नहीं है कि आपको केवल वही काम हाथ में लेने चाहिए जो आप पहले कभी कर चुके हैं. वैसे भी, आपने हर काम कभी-न-कभी तो पहली बार किया ही था.
4. यदि मेरी जिंदगी मेरे मुताबिक नहीं चली तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं है.
मैं कुछ कहूं? सारी गलती आपकी है. इससे आप बुरे शख्स नहीं बन जाते और इससे यह भी साबित नहीं होता कि आप असफल व्यक्ति हैं. आपका अपने विचारों पर नियंत्रण है इसलिए अपने कर्मों के लिए भी आप ही जवाबदेह हैं. आपके विचार और कर्म ही आपके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं. यदि आप अपने जीवन में चल रही गड़बड़ियों के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराएंगे तो मैं यह समझूंगा कि आपका जीवन वाकई दूसरों के हाथों में ही था. उनके हाथों से अपना जीवन वापस ले लें और अपने विचारों एवं कर्मों के प्रति जवाबदेह बनें.
5. मैं सभी लोगों से कमतर हूँ.
ऐसा आपको लगता है पर यह सच नहीं है. आपमें वे काबिलियत हैं जिन्हें कोई छू भी नहीं सकता और दूसरों में वे योग्यताएं हैं जिन्हें आप नहीं पा सकते. ये दोनों ही बातें सच हैं. अपनी शक्तियों और योग्यताओं को पहचानने से आपमें आत्मविश्वास आएगा और दूसरों की सामर्थ्य और कुशलताओं को पहचानने से उनके भीतर आत्मविश्वास जगेगा. आप किसी से भी कमतर नहीं हैं पर ऐसे बहुत से काम हो सकते हैं जिन्हें दूसरे लोग वाकई कई कारणों से आपसे बेहतर कर सकते हों इसलिए अपने दिल को छोटा न करें और स्वयं को विकसित करने के लिए सदैव प्रयासरत रहें.
6. मुझमें ज़रूर कोई कमी होगी तभी मुझे ठुकरा दिया गया.
यह किसी बात का हद से ज्यादा सामान्यीकरण कर देने जैसा है और ऐसा उन लोगों के साथ अक्सर होता है जो किसी के साथ प्रेम-संबंध बनाना चाहते हैं. एक या दो बार ऐसा हो जाता है तो उन्हें लगने लगता है कि ऐसा हमेशा होता रहेगा और उन्हें कभी सच्चा प्यार नहीं मिल पायेगा. प्यार के मसले में लोग सामनेवाले को कई कारणों से ठुकरा देते हैं और ऐसा हर कोई करता है. इससे यह साबित नहीं होता कि आप प्यार के लायक नहीं हैं बल्कि यह कि आपका उस व्यक्ति के विचारों या उम्मीदों से मेल नहीं बैठता, बस इतना ही.
7. यदि मैं खुश रहूँगा तो मेरी खुशियों को नज़र लग जायेगी.
यह बहुत ही बेवकूफी भरी बात है. आपकी ज़िंदगी को भी खुशियों की दरकार है. आपका अतीत बीत चुका है. यदि आपके अतीत के काले साए अभी भी आपकी खुशियों के आड़े आ रहे हों तो आपको इस बारे में किसी अनुभवी और ज्ञानी व्यक्ति से खुलकर बात करनी चाहिए. अपने वर्तमान और भविष्य को अतीत की कालिख से दूर रखें अन्यथा आपका भावी जीवन उनसे दूषित हो जाएगा और आप कभी भी खुश नहीं रह पायेंगे. कोई भी व्यक्ति किसी की खुशियों को नज़र नहीं लगा सकता.
इन अचेतन विचारों से कैसे उबरें?
यह बहुत आसान है. जब भी आपके मन में कोई अचेतन या अतार्किक विचार आये तो आप उसे लपक लें और अपनी विचार प्रक्रिया का अन्वेषण करते हुए उसमें कुछ मामूली फेरबदल कर दें… कुछ इस तरह:
सोचिये कि आप किसी शानदार दिन अपनी प्रिय शर्ट पहनकर जा रहे हैं और एक चिड़िया ने उसपर बीट कर दी. ऐसे में आप सोचेंगे:

“ये @#$% हमेशा मेरे साथ ही क्यों होता है!?”
इसकी जगह आप यह कहें…
“अरे यार… अब तो इस शर्ट को धोना पड़ेगा.”
अपनी बातों में “हमेशा” को खोजें, जो कि अमूमन सही जगह प्रयुक्त नहीं होता. यदि वाकई आपके ऊपर चिड़ियाँ “हमेशा” बीट करतीं रहतीं तो कल्पना कीजिये आप कैसे दिखते. अबसे आप इस तरह की बातें करने से परहेज़ करें. एक और उदाहरण:
“मैं हमेशा ही बारिश में फंस जाता हूँ”… (यदि यह सच होता तो आप इंसान नहीं बल्कि मछली होते).
“मैं/मुझे… कभी नहीं…”{ उदाहरण: “मुझे पार्किंग की जगह कभी नहीं मिलती”… (यदि यह सच होता तो आप अपनी गाड़ी के भीतर ही कैद सुबह से शाम तक घूमते रहते).
“मैं… नहीं कर सकता” {उदाहरण: “मैं दो मील भी पैदल नहीं चल सकता”… (कभी कोशिश की?).
“मुझसे… करते नहीं बनता” {उदाहरण: “मुझसे कई लोगों के सामने बोलते नहीं बनता”… (ऐसा आप अपने परिजनों/दोस्तों याने कई लोगों के सामने ही बोलते हैं).
“कितनी बुरी बात है कि… {उदाहरण: “कितनी बुरी बात है कि सुबह से बारिश हो रही है”… (छोड़िये भी, इतनी भी बुरी बात नहीं है).
इसी तरह के और भी अचेतन व अतार्किक विचार हो सकते हैं जिनकी हमें पहचान करनी है और समय रहते ही उन्हें सकारात्मक विचार से बदल देना है. मुझे आशा है कि इस पोस्ट से आपको अपने जीवन में बदलाव/रूपांतरण लाने के कुछ सूत्र अवश्य मिले होगे. कोई भी बदलाव सहज नहीं होता बल्कि उसके लिए सतत प्रयासरत रहना पड़ता है. यदि पोस्ट में लिखी बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद आप उन्हें अपने जीवन में उतरने का प्रयास करेंगे तो आपको कुछ सफलता ज़रूर मिलगी....

सवेरे जल्दी उठने के दस फायदे और तरीके


  • लियो बबौटा ग्वाम में रहते हैं और एक बहुत उपयोगी ब्लॉग ज़ेन हैबिट्स के ब्लौगर हैं। वे लेखक, धावक, और शाकाहारी हैं। उन्होंने हाल में ही एक बेस्ट-सेलिंग पुस्तक ‘The Power of Less’ लिखी है। उनके ब्लॉग पर आप सफलता पाने, रचनात्मकता बढ़ाने, व्यवस्थित होने, प्रेरित होने, क़र्ज़ से निजात पाने, पैसा बचाने, दुबला होने, अच्छा खाने, सहज रहने, बच्चों का लालन-पालन करने, खुश रहने, और अच्छी आदतें विकसित करने के लिए बेहतरीन पोस्ट पढ़ सकते हैं। सबसे अच्छी बात तो यह है कि लियो ने सभी को अपने ब्लॉग की सामग्री का किसी भी रूप में उपयोग करने की पूरी छूट दी है (जैसी मैंने दी हुई है)। उनके ब्लॉग की सबसे अच्छी पोस्टों को मैं अनूदित करके आपके लिए प्रस्तुत करूंगा। इसी क्रम में मैं पोस्ट कर रहा हूँ उनकी पोस्ट सवेरे जल्दी उठने के दस फायदे और तरीके।
    अनुवादक : यहाँ मैं ईमानदारी से यह कह दूँ कि मैं ख़ुद सवेरे बहुत जल्दी नहीं उठता हूँ। पानी भरने के लिए सवेरे ६:३० पर उठना पड़ता है। दोपहर दफ्तर में गुज़रती है, ब्लॉगिंग रात को करता हूँ, छोटे-छोटे बच्चों को भी तो देखना है, अकेली पत्नी की सुख-सुविधाओं का ख्याल रखना भी ज़रूरी है, घर-परिवार से दूर अकेले रह रहे लोग आख़िर क्या करें?। लो, मैं तो अपना दुखडा रोने लगा। आप लियो की प्रेरक पोस्ट का अनुवाद पढ़ें और अच्छा लगे तो मुझे बताएं।



    हाल में मेरे एक पाठक ने मेरे रोज़ सवेरे ४:३० बजे उठने की आदत, इसके लाभ और उठने के उपायों के बारे में पूछा। उनका सवाल बहुत अच्छा है पर सच कहूँ तो इसके बारे में मैंने कभी गंभीरता से नहीं सोचा।
    वैसे, इस आदत के कुछ लाभ तो हैं जो मैं आपको बता सकता हूँ:
    पहले मैं आपको यह बता दूँ की यदि आप रात्रिजीवी है और इसी में खुश हैं तो आपको अपनी आदत बदलने की कोई ज़रूरत नहीं है। मेरे लिए रात का उल्लू होने के बाद जल्द उठने वाला जीव बनना बहुत बड़ा परिवर्तन था। इससे मुझे इतने सारे लाभ हुए कि अब मुझसे सवेरे देर से उठा न जाएगा। लाभ ये हैं:
    १ – दिन का अभिवादन – सवेरे जल्दी उठने पर आप एक शानदार दिन की शुरुआत होते देख सकते हैं। सवेरे-सवेरे जल्द उठकर प्रार्थना करने और परमपिता को धन्यवाद देने का संस्कार डाल लें। दलाई लामा कहते हैं – “सवेरे उठकर आप यह सोचें, ‘आज के दिन जागकर मैं धन्य हूँ कि मैं जीवित और सुरक्षित हूँ, मेरा जीवन अनमोल है, मैं इसका सही उपयोग करूँगा। अपनी समस्त ऊर्जा को मैं आत्मविकास में लगाऊँगा, अपने ह्रदय को दूसरों के लिए खोलूँगा, सभी जीवों के कल्याण के लिए काम करूँगा, दूसरों के प्रति मन में अच्छे विचार रखूँगा, किसी से नाराज़ नहीं होऊंगा और किसी का बुरा नहीं सोचूंगा, दूसरों का जितना हित कर सकता हूँ उतना हित करूँगा’”।
    २ – शानदार शुरुआत – पहले तो मैं देर से उठा करता था और बिस्तर से उठते ही ख़ुद को और बच्चों को तैयार करने की जद्दोजहद में लग जाता था। कैसे तो भी बच्चों को स्कूल में छोड़कर दफ्तर देर से पहुँचता था। मैं काम में पिछड़ रहा था, उनींदा सा रहता था, चिडचिडा हो गया था। हर दिन इसी तरह शुरू होता था। अब, मैंने सवेरे के कामों को व्यवस्थित कर लिया है। बहुत सारे छोटे-छोटे काम मैं ८:०० से पहले ही निपटा लेता हूँ। बच्चे और मैं तब तक तैयार हो जाते हैं और जब दूसरे लोग आपाधापी में लगे होते हैं तब मैं काम में लग जाता हूँ। सवेरे जल्दी उठकर अपने दिन की शुरुआत करने से बेहतर और कोई तरीका नहीं है।
    ३ – दिन की शांत शुरुआत – बच्चों की चें-पें, खेलकूद का शोर, गाड़ियों के हार्न, टी वी की चिल्लपों – सवेरे यह सब न के बराबर होता है। सुबह के कुछ घंटे शांतिपूर्ण होते हैं। यह मेरा पसंदीदा समय है। इस समय मैं मानसिक शान्ति का अनुभव करता हूँ, स्वयं को समय दे पता हूँ, खुली हवा में साँस लेता हूँ, मनचाहा पढता हूँ, सोचता हूँ।
    ४ – सूर्योदय का नज़ारा – देर से उठनेवाले लोग हर दिन घटित होनेवाली प्रकृति की आलौकिक प्रतीत होनेवाली बात को नहीं देख पाते – सूर्योदय को। रात काले से गहरे नीले में तब्दील होती है, फ़िर हलके नीले में, और आसमान के एक कोने में दिन की सुगबुगाहट शुरू हो जाती है। प्रकृति अपूर्व रंगों की छटा प्रस्तुत करती है। इस समय दौड़ने की बात ही कुछ और है। दौड़ते हुए मैं दुनिया से कहता हूँ – “कितना शानदार दिन है!” सच में!
    ५ – नाश्ते का आनंद – सवेरे जल्दी उठकर ही आप नाश्ते का आनंद ले सकते हैं। नाश्ता दिनभर का सबसे ज़रूरी भोजन है। नाश्ते के बिना हमारी देह धीमी आंच पर काम करती है और दोपहर के भोजन तक हम इतने भूखे हो जाते हैं की कुछ भी अटरम-सटरम खा कर पेट टाइट कर लेते हैं, जैसे समोसे, जलेबी, पोहा, पकौडे, आदि। सवेरे अच्छा नाश्ता कर लेने से इनकी ज़रूरत नहीं पड़ती। इसके अलावा, चाय-काफी की चुस्कियां लेते हुए सवेरे अख़बार पढ़ना या दफ्तर में काम की शुरुआत करना कितना सुकूनभरा है!
    ६ – कसरत करना – यूँ तो आप दिनभर में या शाम को कभी भी कसरत कर सकते हैं पर सवेरे-सवेरे यह करने का फायदा यह है कि आप इसे फ़िर किसी और समय के लिए टाल नहीं सकते। दिन में या शाम को तो अक्सर कई दूसरे ज़रूरी काम आ जाते हैं और कसरत स्थगित करनी पड़ जाती है।
    ७ – रचनाशीलता होना – सभी इस बात को मानेंगे की सुबह का समय बहुत रचनात्मक ऊर्जा से भरा होता है। सुबह किसी किस्म का व्यवधान नहीं होता और मैं लिखता हूँ, मेल पढता हूँ, ब्लॉगिंग करता हूँ। इस तरह समय की थोड़ी बचत हो जाती है तो मैं शाम को परिवार के साथ वक़्त गुज़र लेता हूँ, जो बहुत ज़रूरी है।
    ८ – लक्ष्य बनाना – क्या आपने अपने लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए हैं? नहीं? आपको करना चाहिए! लक्ष्य बनाइये और सुबह जल्दी उठकर उनकी समीक्षा करिए। इस सप्ताह कोई एक काम करने की ठान लें और उसे समय पर पूरा कर लें। लक्ष्य बनाने के बाद हर सुबह उठकर यह तय करें कि आज आप अपने लक्ष्य को पाने की दिशा में कौन से कदम उठाएंगे! और वह कदम आप हर सुबह सबसे पहले उठायें।
    ९ – काम पर आना-जाना – भयंकर ट्रेफिक में आना-जाना कोई पसंद नहीं करता। दफ्तर/काम के लिए कुछ जल्दी निकल पड़ने से न केवल ट्रेफिक से छुटकारा मिलता है बल्कि काम भी जल्द शुरू हो जाता है। यदि आप कार से जाते हैं तो पेट्रोल बचता है। थोड़ा जल्दी घर से निकल रहें हो तो मोटरसाईकिल चलाने का मज़ा उठा सकते हैं।
    १० – लोगों से मिलना-जुलना – सवेरे जल्दी उठने के कारण लोगों से मिलना-जुलना आसान हो जाता है। जल्दी उठें और तय मुलाक़ात के लिए समय पर चल दें। जिस व्यक्ति से आप मिलने जा रहे हैं वह आपको समय पर आया देखकर प्रभावित हो जाएगा। आपको मुलाक़ात के लिए ख़ुद को तैयार करने का समय भी मिल जाएगा।
    यह तो थे जल्द उठने के कुछ फायदे। अब जल्द उठने के तरीके बताऊंगा:
    * यकायक कोई बड़ा परिवर्तन न करें – यदि आप ८ बजे उठते हैं तो कल सुबह ५ बजे उठेने के लिए अलार्म नहीं लगायें। धीमी शुरुआत करें। कुछ दिनों के लिए समय से १५ मिनट पहले उठने लगें। एक हफ्ते बाद आधे घंटे (१५ मिनट बढाकर) पहले उठने लगें। ऐसा ही तब तक करें जब तक आप तय समय तक न पहुँच जायें।
    * थोड़ा जल्दी सोने का प्रयास करें – देर रात तक टी वी देखने या इन्टरनेट पर बैठने के कारण आपको देर से सोने की आदत होगी लेकिन यदि आप सवेरे जल्दी उठने की ठान लें तो यह आदत आपको बदलनी पड़ेगी। अगर आपको जल्द नींद न भी आती हो तो भी समय से कुछ पहले बिस्तर पर लेट जायें। चाहें तो कोई किताब भी पढ़ सकते हैं। अगर आप दिनभर काम करके ख़ुद को थका देते हों तो आपको जल्द ही नींद आ जायेगी।
    * अलार्म घड़ी को पलंग से दूर रखें – यदि आप अपनी घड़ी या मोबाइल में अलार्म लगाकर उसे सिरहाने रखते हैं तो सवेरे तय समय पर अलार्म बजने पर आप उसे बंद क़र देते हैं या स्नूज़ कर देते हैं। उसे पलंग से दूर रखने पर आपको उसे बंद करने के लिए उठना ही पड़ेगा। एक बार आप पलंग से उतरे नहीं कि आप अपने पैरों पर होंगे! अब पैरों पर ही बनें रहें और काम में लग जायें।
    * अलार्म बंद करते ही बेडरूम से निकल जायें – अपने दिमाग में बिस्तर पर फ़िर से जाने का ख्याल न आने दें। कमरे से बाहर निकल जायें। मेरी आदत है कि मैं उठते ही बाथरूम चला जाता हूँ। बाथरूम से निकलने के बाद ब्रश करते ही दिन शुरू हो जाता है।
    * उधेड़बुन में न रहें – यदि आप सोचते रहे कि उठें या न उठें तो आप उठ नहीं पाएंगे। बिस्तर पर जाने का ख्याल मन में आने ही न दें।
    * अच्छा कारण चुनें – सुबह-सुबह करने के लिए कोई ज़रूरी काम चुन लें। इससे आपको जल्दी उठने में मदद मिलेगी। मैं सवेरे ब्लॉग पर लिखना पसंद करता हूँ – यह मेरा कारण है। जब यह काम हो जाता है तब मैं आपके कमेंट्स पढ़ना पसंद करता हूँ।
    * जल्दी उठने को अपना पारितोषक बनायें – शुरू में यह लग सकता है कि आप जल्दी उठने के चक्कर में ख़ुद को सता रहे हैं। लेकिन यदि आपको इसमें आनंद आने लगा तो आपको यह एक उपहार/पुरस्कार लगने लगेगा। मेरा पारितोषक है गरमागरम कॉफी बनाकर किताब पढ़ना। स्वादिष्ट नाश्ता बनाकर खाना या सूर्योदय देखना या ध्यान करना आपका पारितोषक हो सकता है। कुछ ऐसा ढूंढें जिसमें आपको वास्तविक आनंद मिलता हो और उसे अपनी प्रातः दिनचर्या का अंग बना लें।
    * बाकी बचे हुए समय का लाभ उठायें – सिर्फ़ १-२ घंटा पहले उठकर कम्प्युटर पर ज्यादा काम या ब्लॉगिंग करने में कोई तुक नहीं है। यदि यही आपका लक्ष्य है तो कोई बात नहीं। जल्दी उठकर मिले अतिरिक्त समय का दुरुपयोग न करें। अपने दिन को बेहतर शुरुआत दें। मैं बच्चों का लंच बनाता हूँ, दिन में किए जाने वाले कामों की योजना बनाता हूँ, कसरत/ध्यान करता हूँ, पढता हूँ। सुबह के ६:३० तक तो मैं इतना कर चुका होता हूँ जितना दूसरे कई लोग दिनभर में करते हैं।.......

  • बाबरी ढांचा विध्वंस – हिन्दू एकता का उच्चतम प्रतीक


    बाबरी ढांचा विध्वंस – हिन्दू एकता का उच्चतम प्रतीक

    हमने इतिहास में लिखे हिन्दू एकता के प्रतीकों पर एक दृष्टि डाली. सदैव कहा जाता रहा कि सदियों से हिन्दू मुसलमान इस देश भारत में साथ साथ रहते आये हैं, हमारी संस्कृति गंगा जमुनी है, हमारा प्यार मुहब्बत का रिश्ता है, इंसानियत का रिश्ता है….
    मिसाल के तौर पर इस्लाम के सूफी ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती हर हिन्दू मुसलमान के दिल में बसे हैं. उनकी कब्र पर जहां मुसलमान सर झुकाते हैं तो भाईचारे की भावना से विवश हिन्दू भी सर झुकाते हैं.
    फिर, अजीमोशान शहंशाह अकबर जो हर दिल अजीज हैं, जिन्होंने भारत के राजाओं और प्रजाओं को काट काटकर एक छत्र में खड़ा कर दिया. जिन्होंने धर्म के बन्धनों को तोड़कर छत्तीसों हिन्दू राजपूत कन्याओं को अपने हरम में डालकर अपने सबसे करीब आने का सुनहरा अवसर दिया. क्या इससे बढ़कर हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक कुछ हो सकता है? ये और बात है कि कभी इन शौक़ीन सुल्तानों ने अपने हरम से उत्पन्न हुई किसी स्त्री को किसी हिन्दू को नहीं ब्याहने दिया.
    फिर, टीपू सुलतान ने अपनी मातृभूमि भारत के लिए अंग्रेजों से लड़ाई की और शहीद हो गए.
    अतः मोईनुद्दीन चिश्ती, अकबर, और टीपू सुलतान जैसे व्यक्ति ही वास्तव में हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक हैं, ऐसा हमारे इतिहास को पढने से प्रतीत होता है.
    यह बात अलग है कि कुछ सिरफिरे ऐसे एकता के प्रतीकों पर यह कह कर प्रश्न खडा कर देते हैं कि मोईनुद्दीन चिश्ती तो एक गद्दार घुसपैठिया था जिसने मुहम्मद गौरी को भारत के हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान पर हमला करने के लिए उकसाया था और सहायता दी थी. वे कहते हैं कि अकबर ने जब चित्तौड़ विजय के समय तीस हज़ार निर्दोष लोगों के कत्ले आम के आदेश दिए (और उतनी स्त्रियों को या जल मरने के लिए या अपने सैनिको कि हवस पूर्ती के लिए छोड़ दिया), और उनके सिरों को काटकर उनसे मीनार बनवायीं तो फिर वह एकता का प्रतीक कैसे हुआ? जब टीपू सुलतान ने हजारों हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया और हजारों को क़त्ल किया क्योंकि वे मुसलमान न बने तो फिर वह एकता का प्रतीक कैसे? वे कहते हैं कि टीपू भारत के लिए नहीं बल्कि अपनी हुकूमत के लिए अंग्रेजों से लड़ रहा था.
    सदियों से साथ साथ रहने की बात पर जब ये सिरफिरे सवाल उठाते हैं कि एक समय इस देश की सीमाएं पश्चिम में ईरान को तो पूर्व में बर्मा को छूती थीं, और उत्तर में कश्मीर भी इसी भारत भूमि का अंश था तो फिर ऐसा कैसे हुआ कि सदियों से साथ साथ रहने वाले भाइयों ने हमारी भारत माता को पांच टुकड़ों (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, कश्मीर, बंगलादेश) में तोड़ डाला जिनमें से चार में आज साथ रहने वाले हिन्दू दीखते ही नहीं, तो इस पर सब इतिहासकार और सेकुलरवादी बिफर पड़ते हैं. हम भी इन सिरफिरों से बिलकुल संतुष्ट नहीं!
    अरे! क्या हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए कुछ हिन्दू सिर्फ अपने सिर, अपनी स्त्रियाँ, अपना धर्म और अपनी जमीन भी नहीं दे सकते? क्या हिन्दुओं का यह कर्त्तव्य नहीं था कि दुनिया भर में इस्लामी परोपकार और कल्याणकारी भावना से ओतप्रोत घूम रहे मुगलों, अरबों, तुर्कों आदि को कुछ सिर, बहनें, बेटियां और धर्म अर्पण कर उनके परोपकार का मोल चुकाते? जो मुग़ल आदि सदा अपने मुल्क छोड़कर पराये मुल्क भारत को एक करने के महान उद्देश्य से यहाँ संघर्ष करते रहे, वे इतना तो अधिकार रखते ही थे कि उन्हें पारितोषिक के रूप में धन, स्त्रियाँ, राज्य, धर्म और इन सबसे बढ़कर “एकता का प्रतीक” सम्मान मिले. अरे लानत है ऐसे स्वाभिमानी हिन्दुओं पर जो सांप्रदायिक सद्भाव के लिए इतना भी नहीं कर सकते! इस देश के अधिकाँश इतिहासकारों के लिए यह हर्ष का विषय होना चाहिए कि ऐसा ही हुआ |भले ही कुछ सिरफिरे आज इसका विरोध करते रहें जैसा कि महान मुगलों के समय क्षुद्र महाराणा प्रताप और शिवाजी ने किया था और यहाँ अग्निवीर कर रहा है. पर कौन पूछता है इनको? दिल्ली में ही अकबर, बाबर, हुमायूं, औरंगजेब, लोदी, आदि के नाम पर सड़कों और स्थानों के नाम रखे गए हैं ताकि एकता के धरोहर इन नामों का सम्मान हो सके!
    खैर छोड़ें इन व्यर्थ बातों को.
    आज हम जिस विषय पर लिखने जा रहे हैं, वह सेकुलरवादियों और एकपक्षीय एकता चाहने वालों को शायद अच्छा न लगे. आज से अट्ठारह वर्ष पहले ६ दिसंबर सन १९९२ को इस देश के एक और “एकता के प्रतीक” मुगलों में से एक बाबर के नाम पर बनाया गया एक ढांचा तोड़ डाला गया. इसका इतिहास कुछ ऐसा है कि अयोध्या में बहुत पुराना राम मंदिर हुआ करता था जिस के बारे में करोड़ों हिन्दुओं का यह विश्वास है कि श्रीराम उसी स्थान पर जन्मे थे. इसे कुफ्र की निशानी मानकर बाबर के जिहादियों ने बलपूर्वक तोड़ डाला क्योंकि मूर्तिपूजा इस्लाम में वर्जित है और इसलिए वहां बाबर के नाम की मस्जिद बना दी. राम मंदिर को बलपूर्वक तोड़े जाने की घटना पर एक शब्द भी न निकालने वाले सेकुलरिस्टों और जिहादियों को जैसे ही बाबरी ढांचा टूटने की खबर मिली, उनके हृदयों पर जैसे आकाश टूट पडा, जैसे बिजली सी गिरी या वज्रपात हो गया.
    ठीक ही था, राम ठहरा इस देश के निवासियों का पूर्वज और बाबर ठहरा पराये मुल्क से यहाँ आकर परोपकार के निमित्त धन, स्त्रियाँ, राज्य आदि की व्यवस्था करने वाला जिसका एकमात्र उद्देश्य इस भारत को एकछत्र के नीचे लाकर विश्व का कल्याण करना था! एक राम था जिसने पराया देश लंका विजय करने पर भी राज्य वहीँ के स्थानीय लोगों को दे दिया, उनकी स्त्रियों को माता कहकर उनकी ओर देखा भी नहीं और एक ओर बाबर था जिसने राज्य जीतकर यहाँ के स्थानीय लोगों की सेवा करना ज्यादा उचित समझा और स्त्रियाँ जीतकर इन्हें अपना ही कर्त्तव्य समझ कर अपने हरम की ओर रवाना कर दिया! इस तरह के “एकता के प्रतीक” बाबर के जीवन के कुछ और प्रेरक (?) प्रसंगों को पढने की इच्छा से हमने स्वयं बाबर का लिखा हुआ “बाबरनामा” पढ़ा जिसमें उसने अपने जीवन की घटनाएं अपनी लेखनी से ही लिखी हैं ताकि आने वाली पीढी भी उनसे कुछ सीख ले सके. आप भी बाबरनामा को यहाँ पढ़ सकते हैं http://www.archive.org/details/baburnama017152mbp
    हमारा यह दृढ विश्वास था कि बाबर एक पक्का मुसलमान था और इस्लामी रिवाज के अनुसार अपने देश से अधिक दूसरे देशों के लोगों, धर्म, राज्य और स्त्रियों का अधिक ध्यान उसे सताता था. पर अचानक हमने कुछ ऐसा पढ़ा कि जिससे इस महात्मा मोमिन बाबर के चरित्र के कुछ और रंग सामने आये! और तब हमें लगा कि हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीकों में से सबसे अधिक यदि कोई मूल्यवान है तो वह है बाबरी ढाँचे का विध्ध्वंस. चौंकिए नहीं! खुद बाबर के लिखे बाबरनामा से यह पता चलता है कि राम मंदिर तोड़कर उसके नाम पर बनाया गया ढांचा असल में मस्जिद ही नहीं था! ऐसा इसलिए क्योंकि बाबर खुद मुसलमान ही नहीं था! क्योंकि-
    बाबर एक समलैंगिक (homosexual), नशेड़ी, शराबी, और बाल उत्पीड़क (child molester) था
    बाबरनामा के विभिन्न पृष्ठों से लिए गए निम्नलिखित अंश पढ़िए
    १. पृष्ठ १२०-१२१ पर बाबर लिखता है कि वह अपनी पत्नी में अधिक रूचि नहीं लेता था बल्कि वह तो बाबरी नाम के एक लड़के का दीवाना था. वह लिखता है कि उसने कभी किसी को इतना प्यार नहीं किया कि जितना दीवानापन उसे उस लड़के के लिए था. यहाँ तक कि वह उस लड़के पर शायरी भी करता था. उदाहरण के लिए- “मुझ सा दर्दीला, जुनूनी और बेइज्जत आशिक और कोई नहीं है. और मेरे आशिक जैसा बेदर्द और तड़पाने वाला भी कोई और नहीं है.”
    २. बाबर लिखता है कि जब बाबरी उसके ‘करीब’ आता था तो बाबर इतना रोमांचित हो जाता था कि उसके मुंह से शब्द भी नहीं निकलते थे. इश्क के नशे और उत्तेजना में वह बाबरी को उसके प्यार के लिए धन्यवाद देने को भी मुंह नहीं खोल पता था.
    ३. एक बार बाबर अपने दोस्तों के साथ एक गली से गुजर रहा था तो अचानक उसका सामना बाबरी से हो गया! बाबर इससे इतना उत्तेजित हो गया कि बोलना बंद हो गया, यहाँ तक कि बाबरी के चेहरे पर नजर डालना भी नामुमकिन हो गया. वह लिखता है- “मैं अपने आशिक को देखकर शर्म से डूब जाता हूँ. मेरे दोस्तों की नजर मुझ पर टिकी होती है और मेरी किसी और पर.” स्पष्ट है की ये सब साथी मिलकर क्या गुल खिलाते थे!
    ४. बाबर लिखता है कि बाबरी के जूनून और चाह में वह बिना कुछ देखे पागलों की तरह नंगे सिर और नागे पाँव इधर उधर घूमता रहता था.
    ५. वह लिखता है- “मैं उत्तेजना और रोमांच से पागल हो जाता था. मुझे नहीं पता था कि आशिकों को यह सब सहना होता है. ना मैं तुमसे दूर जा सकता हूँ और न उत्तेजना की वजह से तुम्हारे पास ठहर सकता हूँ. ओ मेरे आशिक (पुरुष)! तुमने मुझे बिलकुल पागल बना दिया है”.



    इन तथ्यों से पता चलता है कि बाबर और उसके साथी समलैंगिक और बाल उत्पीड़क थे. अब यदि इस्लामी शरियत की बात करें तो समलैंगिकों के लिए मौत की सजा ही मुक़र्रर की जाती है. बहुत से इस्लामी देशों में यह सजा आज भी दी जाती है. बाबर को भी यही सजा मिलनी चाहिए थी. दूसरी बात यह है कि उसके नाम पर बनाए ढाँचे का नाम “बाबरी मस्जिद” था जो कि उसके पुरुष आशिक “बाबरी” के नाम पर था! हम पूछते हैं कि क्या अल्लाह के इबादत के लिए कोई ऐसी जगह क़ुबूल की जा सकती है कि जिसका नाम ही समलैंगिकता के प्रतीक बाबर के पुरुष आशिक “बाबरी” के नाम पर रखा गया हो? इससे भी बढ़कर एक आदमी द्वारा जो कि मुसलमान ही नहीं हो, समलैंगिक और बच्चों से कुकर्म करने वाला हो, उसके नाम पर मस्जिद किसी भी मुसलमान को कैसे क़ुबूल हो सकती है?
    यह सिद्ध हो गया है कि बाबरी मस्जिद कोई इबादतघर नहीं लेकिन समलैंगिकता और बाल उत्पीडन का प्रतीक जरूर थी.और इस तरह यह अल्लाह, मुहम्मद, इस्लाम आदि के नाम पर कलंक थी कि जिसको खुद मुसलमानों द्वारा ही नेस्तोनाबूत कर दिया जाना चाहिए था. खैर वे यह नहीं कर सके पर जिसने यह काम किया है उनको बधाई और धन्यवाद तो जरूर देना चाहिए था. यह बहुत शर्म की बात है कि पशुतुल्य और समलैंगिकता के महादोष से ग्रसित आदमी के बनाए ढाँचे को, जो कि भारत की हार का प्रतीक था, यहाँ के इतिहासकारों, मुसलमानों, और सेकुलरवादियों ने किसी अमूल्य धरोहर की तरह संजो कर रखना चाहा.
    यह ऐसी ही बात है कि जैसे मुंबई में छत्रपति शिवाजी टर्मिनल्स स्टेशन पर नपुंसक और कायर आतंकवादी अजमल कसब द्वारा निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारने के उपलक्ष्य में उस स्थान का नाम “कसब भूमि” रखकर उसे भी धरोहर बना दिया जाये!
    बाबर नरसंहारक, लुटेरा, बलात्कारी, शराबी और नशेड़ी था
    यहाँ पर इस विषय में कुछ ही प्रमाण इस दरिन्दे की लिखी जीवनी बाबरनामा से दिए जा रहे हैं. इसके और अधिक कारनामे जानने के लिए पूरी पुस्तक पढ़ लें.
    पृष्ठ २३२- वह लिखता है कि उसकी सेना ने निरपराध अफगानों के सिर काट लिए जो उसके साथ शान्ति की बात करने आ रहे थे. इन कटे हुए सिरों से इसने मीनार बनवाई. ऐसा ही कुछ इसने हंगू में किया जहाँ २०० अफगानियों के सिर काट कर खम्बे बनाए गए.
    पृष्ठ ३७०- क्योंकि बाजौड़ में रहने वाले लोग दीन (इस्लाम) को नहीं मानते थे इसलिए वहां ३००० लोगों का क़त्ल कर दिया गया और उनके बीवी बच्चों को गुलाम बना लिया गया.
    पृष्ठ ३७१- गुलामों में से कुछों के सिर काटकर काबुल और बल्ख भेजे गए ताकि फतह की सूचना दी जा सके.
    पृष्ठ ३७१- कटे हुए सिरों के खम्बे बनाए गए ताकि जीत का जश्न मनाया जा सके.
    पृष्ठ ३७१- मुहर्रम की एक रात को जश्न मनाने के लिए शराब की एक महफ़िल जमाई गयी जिसमें हमने पूरी रात पी. (पूरे बाबरनामा में जगह जगह ऐसी शराब की महफ़िलों का वर्णन है. ध्यान रहे कि शराब इस्लाम में हराम है.)
    पृष्ठ ३७३- बाबर ने एक बार ऐसा नशा किया कि नमाज पढने भी न जा सका. आगे लिखता है कि यदि ऐसा नशा वह आज करता तो उसे पहले से आधा नशा भी नहीं होता.
    पृष्ठ ३७४- बाबर ने अपने हरम की बहुत सी महिलाओं से बहुत से बच्चे उत्पन्न किये. उसकी पहली बेगम ने उससे वादा किया कि वह उसके हर बच्चे को अपनाएगी चाहे वे किसी भी बेगम से हुए हों, ऐसा इसलिए क्योंकि उसके पैदा किये कुछ बच्चे चल बसे थे. यह तो जाहिर ही है कि इसके हरम बनाम मुर्गीखाने में इसकी हवस मिटाने के लिए कुछ हजार औरतें तो होंगी ही जैसे कि इसके पोते स्वनामधन्य अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं जो इसकी ३६ (छत्तीस) पत्नियों से अलग थीं. यह बात अलग है कि इसका हरम अधिकतर समय सूना ही रहता होगा क्योंकि इसको स्त्रियों से अधिक पुरुष और बच्चे पसंद थे! और बाबरी नाम के बच्चे में तो इसके प्राण ही बसे थे.
    पृष्ठ ३८५-३८८- अपने बेटे हुमायूं के पैदा होने पर बाबर बहुत खुश हुआ था, इतना कि इसका जश्न मनाने के लिए अपने दोस्तों के साथ नाव में गया जहां पूरी रात इसने शराब पी और नशीली चीजें खाकर अलग से नशा किया. फिर जब नशा इनके सिरों में चढ़ गया तो आपस में लड़ाई हुई और महफ़िल बिखर गयी. इसी तरह एक और शराब की महफ़िल में इसने बहुत उल्टी की और सुबह तक सब कुछ भूल गया.
    पृष्ठ ५२७- एक और महफ़िल एक मीनारों और गुम्बद वाली इमारत में हुई थी जो आगरा में है. (ध्यान रहे यह इमारत ताजमहल ही है जिसे अधिकाँश सेकुलर इतिहासकार शाहजहाँ की बनायी बताते हैं, क्योंकि आगरा में इस प्रकार की कोई और इमारत न पहले थी और न आज है! शाहजहाँ से चार पीढी पहले जिस महल में उसके दादा ने गुलछर्रे उड़ाए थे उसे वह खुद कैसे बनवा सकता है?)
    बाबरनामा का लगभग हर एक पन्ना इस दरिन्दे के कातिल होने, लुटेरा होने, और दुराचारी होने का सबूत है. यहाँ यह याद रखना चाहिए कि जिस तरह बाबर यह सब लिखता है, उससे यह पता चलता है कि उसे इन सब बातों का गर्व है, इस बात का पता उन्हें चल जाएगा जो इसके बाबरनामा को पढेंगे. आश्चर्य इस बात का है कि जिन बातों पर इसे गर्व था यदि वे ही इतनी भयानक हैं तो जो आदतें इसकी कमजोरी रही होंगी, जिन्हें इसने लिखा ही नहीं, वे कैसी क़यामत ढहाने वाली होंगी?
    सारांश
    १. यदि एक आदमी समलैंगिक होकर भी मुसलमान हो सकता है, बच्चों के साथ दुराचार करके भी मुसलमान हो सकता है, चार से ज्यादा शादियाँ करके भी मुसलमान हो सकता है, शराब पीकर नमाज न पढ़कर भी मुसलमान हो सकता है, चरस, गांजा, अफीम खाकर भी मुसलमान हो सकता है, हजारों लोगों के सिर काटकर उनसे मीनार बनाकर भी मुसलमान हो सकता है, लूट और बलात्कार करके भी मुसलमान हो सकता है तो फिर वह कौन है जो मुसलमान नहीं हो सकता? क्या इस्लाम इस सब की इजाजत देता है? यदि नहीं तो आज तक किसी मौलवी मुल्ला ने इस विषय पर एक शब्द भी क्यों नहीं कहा?
    २. केवल यही नहीं, जो यह सब करके अपने या अपने पुरुष आशिक के नाम की मस्जिद बनवा दे, ऐसी जगह को मस्जिद कहना हराम नहीं है क्या? क्या किसी बलात्कारी समलैंगिक शराबी व्यभिचारी के पुरुष आशिक के नाम की मस्जिद में अता की गयी नमाज अल्लाह को क़ुबूल होगी? यदि हाँ तो अल्लाह ने इन सबको हराम क्यों बताया? यदि नहीं तो अधिकतर मुसलमान और मौलवी इस जगह को मस्जिद कहकर दंगा फसाद क्यों कर रहे हैं? क्या इसका टूटना इस्लाम पर लगे कलंक को मिटाने जैसा नहीं था? क्या यह काम खुद मुसलमानों को नहीं करना चाहिए था?
    ३. जब इस दरिन्दे बाबर ने खुद क़ुबूल किया है कि इसने हजारों के सिर कटवाए और कुफ्र को मिटाया तो फिर आजकल केजाकिर नाइक जैसे आतंकी मुल्ला यह क्यों कहते हैं कि इस्लाम तलवार के बल पर भारत में नहीं फैला? जब खुद अकबर (जिसको इतिहासकारों द्वारा हिन्दुओं का रक्षक कहा गया है और जान ए हिन्दुस्तान नाम से पुकारा गया है) जैसा नेकदिल (?) भी हजारों हिन्दुओं के सिरों को काटकर उनके खम्बे बनाने में प्रसिद्ध था तो फिर यह कैसे माना जाए कि इस्लाम तलवार से नहीं फैला? क्या ये लक्षण शान्ति से धर्म फैलाने के हैं? फिर इस्लाम का मतलब ‘शान्ति’ कैसे हुआ?
    ४. भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश में रहने वाले सब मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू ही थे जो हजारों सालों से यहाँ रहते आ रहे थे. जब बाबर जैसे और इससे भी अधिक दरिंदों ने आकर यहाँ मारकाट बलात्कार और तबाही मचाई, सिरों को काटकर मीनारें लहरायीं तो दहशत के इस वातावरण में बहुत से हिन्दुओं ने अपना धर्म बदल लिया और उन्हीं लाचार पूर्वजों की संतानें आज मुसलमान होकर अपने असली धर्म के खिलाफ आग उगल रही हैं. जिन मुसलमानों के बाबरी मस्जिद (?) विध्ध्वंस पर आंसू नहीं थम रहे, जो बार बार यही कसम खा रहे हैं कि बाबरी मस्जिद ही बनेगी, जो बाबर को अपना पूर्वज मान बैठे हैं, ज़रा एक बार खुद से सवाल तो करें- क्या मेरे पूर्वज अरब, तुर्क या मंगोल से आये थे? क्या मेरे पूर्वज इस भारत भूमि की पैदावार नहीं थे? कटे हुए सिरों की मीनारें देखकर भय से धर्म परिवर्तन करने वाले पूर्वजों के वंशज आज कौन हैं, कहाँ हैं, क्या कभी सोचा है? क्या यह विचार कभी मन में नहीं आता कि इतने कत्ले आम और बलात्कार होने पर विवश माता पिताओं के वे लाल आज कहाँ हैं कि जिन्हें अपना धर्म, माता, पिता सब खोने पड़े? क्या भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश में रहने वाले ७०-८० करोड़ मुसलमान सीधे अरबों, तुर्कों के वंशज हैं? कभी यह नहीं सोचा कि इतने मुसलमान तो अरब, तुर्क, ईरान, ईराक में मिला कर भी नहीं हैं जो इस्लाम के फैलाने में कारण बने? क्या तुम्हारे पूर्वज राम को नहीं मानते थे? क्या बलपूर्वक अत्याचार के कारण तुम्हारे पूर्वजों का धर्म बदलने से तुम्हारा पूर्वज राम की बजाय बाबर हो जाएगा? अगर नहीं तो आज अपने असली पूर्वज राम को गाली और अपने पूर्वजों के कातिल और बलात्कारी बाबर का गुणगान क्यों?
    ५. अयोध्या की तरह काशी, मथुरा और हजारों ऐसी ही जगहें जिन्हें मस्जिद कह कर इस्लाम का मजाक उड़ाया जाता है, जो बाबर की तरह ही इसके पूर्वजों और वंशजों की हवस की निशानियाँ हैं, इनको मुसलमान खुद क्यों मस्जिद मानने से इनकार नहीं करते?
    ६. यदि बाबरी ढांचा टूटना गलत था तो राम मंदिर टूटना गलत क्यों नहीं था? यदि राम मंदिर की बात पुरानी हो गयी है तो ढांचा टूटने की बात भी तो कोई नयी नहीं! तो फिर उस पर हायतौबा क्यों?
    अंत में हम कहेंगे कि जिस तरह भारत में रहने वाले हिन्दू मुसलमानों के पूर्वजों पर अत्याचार और बलात्कार करने वाले वहशी दरिन्दे बाबर के नाम का ढांचा आज नहीं है उसी तरह बाकी सब ढांचे जो तथाकथित इस्लामी राज्य के दौरान मंदिरों को तोड़कर बनवाये गए थे, जो सब हिन्दू मुसलमानों के पूर्वजों के अपमान के प्रतीक हैं, उनको अविलम्ब मिट्टी में मिला दिया जाए और इसकी पहल हमारे खून के भाई मुसलमान ही करें जिनके साथ हमारा हजारों लाखों सालों का रक्त सम्बन्ध है. इस देश में रहने वाले किसी आदमी की, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, धमनियों में दरिन्दे जानवर बाबर या अकबर का खून नहीं किन्तु राम, कृष्ण, महाराणा प्रताप और शिवाजी का खून है. और इस एक खून की शपथ लेकर सबको यह प्रण करना है कि अब हमारे पूर्वजों पर लगा कोई कलंक भी देश में नहीं रह पायेगा.
    क्या दृश्य होगा कि हिन्दू एक साथ अपने एक पूर्वजों पर लगे कलंकों को गिराएंगे और उस जगह अपने पूर्वजों की यादगार के साथ साथ उनके असली धर्म वेद की पाठशाला बनायेंगे जहां राम और कृष्ण जैसे धर्मयोद्धा तैयार होंगे कि फिर कोई बाबर आकर इस भूमि के पुत्रों को उनके माता पिता, दोस्तों और धर्म से अलग न कर सके!
    ६ दिसंबर १९९२ के दिन हिन्दू एकता के सबसे बड़े प्रतीक की स्थापना करने वाले सभी भाई-बहनों को हम सब हिन्दू का कोटि-कोटि नमन....

    प्राचीन आर्य इतिहास का भौगोलिक आधार


    भारतीय आर्यों के प्राचीन इतिहास तथा भूगोल का अज्ञान, या तो हमारे आलस्य के कारण या हमारी बहुमूल्य ऐतिहासिक पुस्तकों के शत्रुओं द्वारा नष्ट हो जाने के कारण, अभी तक हमें पूर्ण निश्चय के साथ यह उद्घोषित करने का अवसर नहीं देता कि हमारी प्राचीन आर्य संस्कृति किस श्रेणी तक उस समय पहुंच चुकी थी, जिस समय आधुनिक नव्य-सभ्य राष्ट्रों का उदय तो कौन कहे, नाम व निशान भी नहीं था ! अवश्य ही हमारे प्राचीन इतिहास के अनुशीलन में योरपीय विद्वानों ने जो सहायता पहुंचायी है, वह बहुमूल्य है। विदेशी होकर भी आज तक उन लोगों ने जो कुछ किया, वह आशातीत और हमारी आंखें खोलने के लिये पर्याप्त है। हमारा इतिहास कुछ ख्रीष्टाब्द या विक्रमाब्द से मर्यादित नहीं; यह तो सृष्टि-सनातन और आधुनिक विद्वानों के मस्तिष्क रूपी अनुवीक्षण यन्त्र की दृष्टि से बाहर है। सच पूछा जाय, तो आर्यों का इतिहास ही विश्व का इतिहास है। आज तक यह कोई भी ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि आर्यों का सम्पूर्ण इतिहास विश्व की विद्वन्मण्डली को कब दृष्टिगोचर होगा। योरपीय विद्वानों ने अन्धकार से निकलने की युक्ति हमें बता दी है। अब तो हमारा कर्तव्य है कि अपने इतिहास का देदीप्यमान चित्र विश्व के सामने रख दें। पाश्चात्य विद्वानों की प्रायः यह धारणा रही है और है कि भारतवासी आर्य इतिहास लिखना या सुरक्षित रखना नहींजानते थे। यह विवाद, जो किसी भी भारतीय विद्वान् को असह्य है, बहुत दिनों से चला आ रहा है। प्राचीन इतिहास के अनुशीलन के लिये प्रायः दो परिपाटी चल पड़ी हैं, और ऐतिहासिक तत्त्वों का स्पष्टीकरण भी प्रायः दो ज़ुदे-ज़ुदे मार्गों से हो रहा है। पाश्चात्य विद्वान् अवश्य ही समय-निर्धारण में अत्यन्त संकोच और द्वेष बुद्धि से काम लेते आये हैं। यह आज बिल्कुल निर्विवाद है कि हमारे आर्य ऋषि-प्रवर साहित्य, ज्योतिष, विज्ञान, आयुर्वेद आदि समस्त कलाओं में उस पूर्णता तक पहुंच चुके थे, जो आज भी योरप के लिये स्वप्नवत् प्रतीत हो रही है। यह एक सत्य है, जिसे पहले तो नहीं, परन्तु अब प्रत्येक पाश्चात्य विद्वान् मुक्त-कण्ठ से स्वीकार कर रहा है। हाँ, समय निर्धारण का प्रश्न बड़ा ही जटिल है, और वह भी इसलिये कि हमारे पास ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव-सा समझा जाता है। हमारे हृदय सम्राट् बाल गङ्गाधर तिलक का ’ओरायन’ गन्थ इस दिशा में हमें बहुत कुछ प्रकाश में ला चुका है। उनका विचार एवं निष्कर्ष ज्योतिष, गणित और वैदिक ऋचाओं पर अवलम्बित है। सच तो यह है कि जिस समय हम थे, उस समय हमारी जाति के सिवा संसार में और कोई भी सभ्य जाति नहीं के बराबर थी। हमारी ऐतिहासिक प्राचीनता में एक ऐतिहासिक गौरव सन्निहित है। आज "हम" हम नहीं, आज बहुतेरे हम हो गये और इसी हमाहमी में एक भारतीय इतिहास ही नहीं, प्रत्युत विश्व इतिहास झगड़े की चीज़ बन गया। संसार में आर्य और अनार्य दो ही मुख्य जातियां हैं। आर्यों की शाखायें-प्रशाखायें इतनी बढ़ गयी हैं कि उस अन्धकार में इतिहास के पन्ने उलटना बड़ी विकट समस्या है। उस पर एक आश्चर्य यह कि सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास के मुख्यतः दो ही आधार हैं-एक तो वैदिक साहित्य, और दूसरे भौगोलिक आधार पर पृथ्वी की भिन्न-भिन्न सतहों की खोज। दिन-दिन हमारे इतिहास को नव-नव प्रकाश मिलता जा रहा है। आर्य-इतिहास एक बुझौवल या प्रहेलिका के रूप में हमें मिल रहा है। वैदिक साहित्य की व्याख्यान का रूप दिन-दिन विकसित और गम्भीर होता जा रहा है। सच पूछिये तो वैदिक साहित्य संसार-मात्र का साहित्य हो रहा है। इसमें सभी समान रूप से दिलचस्पी ले रहे हैं। कोई नहीं कह सकता कि भविष्य में हमारे आर्य इतिहास का क्या रूप होगा तथा हमारा अन्तर-राष्ट्रीय सम्बन्ध कैसा रहेगा। हमारा समस्त साहित्य विश्व का साहित्य हो रहा है। कौन कह सकता है कि हमारे दर्शन, साहित्य और इतिहास एक दिन विश्वमात्र के लिये दर्शन, साहित्य और इतिहास नहीं हो जायँगे ? विश्व आज उसी की पुनरावृत्ति कर रहा है, जो आर्य लोग कर चुके हैं; और सम्भवतः वहीं पहुँचेगा, जहाँ हम एक बार पहुँचकर भटक से गये हैं। यह एक ऐतिहासिक सत्य है। यह एक दिन सबके सामने आयेगा। इसी से कहा जाता है कि अन्तर-राष्ट्रीय मिलन का एकमात्र आधार भारतवर्ष होगा; क्योंकि उसकी कुंजी इसी के हाथ मॆं है।
    हाँ, तो हमारा इतिहास आज एक प्रकार से प्रमाणों के अभाव में Mythology सा बन गया है। पुराण गप्प-सा बन गया है और रामायण और महाभारत को रूपक का रूप मिल गया है ! यह हमारे लिये लाचारी और लज्जा की बात है । भारतीय विद्वान् इसी गुत्थी के सुलझाने का प्रयत्न कर रहे हैं । विद्वद्वर श्रीयुत् के. पी. जायसवाल ने, बिहार और ओरिसा-रिसर्च-सोसाइटी के जर्नल में , गर्ग-संहिता के एक अध्याय के आधार पर यह साफ-साफ साबित कर दिया है कि भारतवासी इतिहास लिखना जानते थे, तथा गर्ग के ऐतिहासिक अध्याय से हम प्राचीन राजवंश के इतिहास तक निर्विघ्न पहुँच जा सकते हैं । बहुत निकट-भविष्य में महाभारत से आज तक का सुसम्बद्ध इतिहास हमारे सामने आ जायगा, ऐसी आशा की जाती है। गर्ग-संहिता का ऐतिहासिक विवरण ग्रीक विद्वानों के उस ऐतिहासिक विवरण से मिल जाता है , जो उन्होंने भारतवर्ष के बारे में लिखा है । जायसवालजी का यह प्रयत्न ऐतिहासिक संसार में युगान्तर पैदा कर सकता है । अपार संस्कृत-साहित्य के अनुशीलन से ही हम अपने इतिहास की खोज करने में सफल मनोरथ हो सकते हैं । लोकमान्य तिलक हमारे पथ-प्रदर्शक हो गये हैं; अब हमें आगे बढ़ना है । हमें इस लेख में भौगोलिक आधार पर भारत के प्राचीन इतिहास के दिग्दर्शन कराने का प्रयत्न करना है । इस सम्बन्ध में उपनिषद्, पुराण और महाभारत के भौगोलिक वर्णनों से हमें बहुत कुछ पता लग सकता है। श्रीमद्भागवत में तो भूगोल का पूर्ण ख़ाका ही खींचा गया है । इस लेख में मैं केवल भौगोलिक आधार पर यह सिद्ध करने की कोशिश करूँगा कि आर्य लोग भारतवर्ष में काबुल की ओर से न आकर काश्मीर की राह से आये और सिन्धु-नदी के किनारे-किनारे आकर सारे पंजाब में बस गये । पंजाब से वे पश्चिमोत्तर की ओर बढ़ते-बढ़ते काबुल नदी के आस-पास तक पहुँच गये और वहीं पर आर्यों की उस शाखा से उनकी मुठभेड़ हुई, जो ऑक्सस-नदी के पश्चिमोत्तर-प्रदेश Airya nem Vaejo (अरियानम् व्वज) अर्थात् ’आर्यानां व्रजः’ से आर्यों की भारतीय शाखा से विलग हो गयी । उनका भारतीय आर्यों से मतैक्य नहीं था, तथा वे भारतीय आर्यों को देव-पूजक कहने लगे थे। भारतीय आर्य उन्हें ’असुर’ कह कर पुकारते थे । ऋग्वेद में ’असुर’ शब्द का अर्थ वही नहीं है, जो आज समझा जाता है। पहले ’असुं राति लाति ददाति इति असुरः’ अर्थात् देवता के अर्थ में ’असुर’ शब्द प्रयुक्त होता था। अब इसका अर्थ हो गया है-’न सुरः असुरः’। इरानी आर्यों से भारतीय आर्यों की लड़ाई का मुख्य कारण बतलाना तो मुश्किल है, परन्तु इतना कहा जा सकता है कि इस द्वेष का कारण कुछ तो आर्थिक और कुछ धार्मिक था । हम ऋग्वेद में देखते हैं कि आर्यों के देवों की संख्या क्रमशः बढ़ती जाती है। अवेस्ता में वैदिक साहित्य के ब्राह्मण भाग का कोई भी संकेत नहीं मिलता। हाँ, ऋग्वेद की भाँति जिन्दा-अवेस्ता में मन्त्र और सूत्र अवश्य विद्यमान हैं। मन्त्र का रूप उसमें ’मन्थ्रन्’ है। पारसियों के पवित्र ग्रन्थों का नाम ’मन्थ्र-स्वेन्त’ है। अवेस्ता के देवताओं में- जो भारतीय आर्यों से मिलते-जुलते हैं-मित्र, वरुण, आर्यमन् और यमी (यम) है। वैदिक साहित्य में इधर आर्यों ने दिन-दिन विकास प्राप्त किया। विचार-धारा शाश्वत रूप से बहती गयी।
    भारतीय आर्य तथा पारसियों की भौगोलिक स्थिति और आलोचना-अब भारतीय तथा पारसियों की भौगोलिक स्थिति पर सम्यक् विचार करके मैं यह स्पष्ट करूँगा कि किस तरह भारतीय साहित्य में वर्णित भूगोल की परिपाटी अवेस्ता के भूगोल से भिन्न है। पहले मैं संक्षेप में वायु-पुराण में वर्णित जम्बूद्वीप में आये देशों की सूची देता हूँ-

    इदम् हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम्। हेमकूटं परं तस्मात् नाम्ना किम्पुरुषं स्मृतम्॥
    नैषधं हेमकूटात् तु हरिवर्षं तदुच्यते। हरिवर्षात् परञ्चैव मेरोश्च तदिलावृतम्॥
    इलावृतात् परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम्। रम्यात् परं श्वेत विश्रुतं तत् हिरण्मयम्॥
    हिरण्मयात् परं चापि शृंगवांस्तु कुरुः स्मृतम्। (वायु पुराण)
    (१) हैमवत् वर्ष अर्थात् प्रसिद्ध भारतवर्ष,
    (२) उसके बाद हेमकूट पर्वत है, जिसे किम्पुरुष देश कहते हैं,
    (३) हेमकूट के बाद नैषध है, जिसे हरिवर्ष कहते हैं,
    (४) हरिवर्ष के बाद मेरु-पर्वत के उत्तर इलावृत है,
    (५) इलावृत के बाद नील वर्ष है, जो ’रम्यक’ नामसे प्रसिद्ध है,
    (६) रम्यक के उत्तर श्वेत-प्रदेश है, जिसे हिरण्मय कहते हैं और
    (७) हिरण्मय के बाद शृंगवान् है, जो कुरु नाम से प्रख्यात है।
    इस प्रकार जम्बूद्वीप के अन्तर्गत वायुपुराण के अनुसार सात देश हुये। सातों देशों में सबसे उत्तर कुरु देश हुआ। यह ’कुरु’ कहाँ है सो ब्रह्माण्डपुराण के निम्न-लिखित श्लोक से स्पष्ट हो जाता है-
    उत्तरस्य समुद्रस्य समुद्रान्ते च दक्षिणे। कुरवः तत्र तद्वर्षं पुण्यं सिद्ध-निषेवितम्॥
    यह कुरु उत्तरीय समुद्र के दक्षिण की ओर बसा हुआ है। यहाँ सिद्ध पुरुष रहते हैं, जिनका नाम ’कुरु’ है।

    अवश्य ही यह कुरु उत्तरसागर के दक्षिण रहा होगा, जो उत्तर ध्रुव के उत्तरीय वृत्त में बसा होगा। इससे लो. तिलक की सम्मति को कोई आघात नहीं पहुँचता। परन्तु प्रश्न यह होता है कि इस कुरु और भरत-खण्ड के कुरु में क्या सम्बन्ध है ? इसका समाधान मैं पीछे करूँगा। तब तक यह देख लेना चाहिये कि इस कुरु का हमारे पुराणों में कैसा वर्णन आया है। पद्मपुराण के निम्नलिखित श्लोक अनावश्यक नहीं कहे जा सकते-

    उत्तरेण तु शृंगस्य समुद्रान्ते द्विजोत्तमाः। वर्षमैरावतं नाम तस्मात् शृंगवतः परम्॥
    न तु तत्र सूर्यगतिः न जीर्य्यन्ति च मानवाः। चन्द्रमाश्च सनक्षत्रो ज्योतिर्भूत इवावृतः॥

    अर्थात्, शृंग के उत्तर समुद्र के अन्त में ऐरावत वर्ष है, जहाँ ’द्विजों में श्रेष्ठ ’ रहते हैं। यह वर्ष शृंगवान् के बाद है तथा यहाँ पर न तो सूर्य की गति है, न मनुष्य जीर्ण होते हैं और स-नक्षत्र चन्द्रमा शाश्वत चमकते रहते हैं।
    यहाँ उत्तरतम प्रदेश कुरु न होकर ऐरावत हो गया है। किन्तु पद्मपुराण के अनुसार उत्तर कुरु को इस मेरु और नील के मध्य में पाते हैं। जैसे-

    दक्षिणेन तु नीलस्य मेरोः पार्श्वे तथोत्तरे। उत्तराः कुरवो विप्राः पुण्याः सिद्धनिषेविताः॥
    इस श्लोक में हम ब्रह्माण्डपुराण की छाया तो अवश्य पाते हैं, परन्तु कुरु यहाँ उत्तर-कुरु होकर, उत्तर-ध्रुव के निकटवर्त्ती प्रदेशों से हटकर, मेरु और नील के मध्य में आ गया है। अवश्य ही यह आर्यों के स्थानान्तरित होने का सूचक है। आर्य लोग मध्य-एशिआ की ओर बढ़ते आते हैं और अपने प्रिय प्रदेश का नाम अपने साथ लेते आते हैं, जो मध्य-एशिआ से दक्षिण की ओर हटते-हटते, भरत-खण्ड में कुरु-पाञ्चाल के रूप में परिवर्तित हो गया है। यह मैं उपसंहार में दिखलाऊँगा। तब तक मैं अन्य प्रमाण द्वारा यह सिद्ध करूँगा कि यही कुरु महाभारत में हरिवर्ष में किस प्रकार आ गया है।
    अर्जुन की विजय-यात्रा और कुरु या उत्तरकुरु
    महाभारत के सभा-पर्व में अर्जुन की विजय-यात्रा के प्रसंग में भी उत्तर-कुरु का उल्लेख आया है। इसमें उत्तर-कुरु लोगों का हरिवर्ष में रहना सिद्ध होता है। यह हरिवर्ष अब उत्तरीय ध्रुव के समीपवर्ती वृत्त के अन्तर्गत नहीं है। यह बहुत ही दक्षिण की ओर हटकर मानसरोवर के प्रदेशों के उत्तर में बतलाया जाता है। अर्जुन का विजय क्रम इस प्रकार है-वह पहले
    (१) श्वेत पर्वत को पार कर किम्पुरुषों के रहने की जगह पर अर्थात् किम्पुरुष-वर्ष में जाते हैं, जो द्रुमराजा के पुत्र द्वारा रक्षित है।
    (२) तदनन्तर उन्हें जीतकर और उनसे कर ले गुह्यकों से रक्षित ’हाटक’ नाम के देश में चले गये। उन्हें भी जीतकर वह मानसरोवर की ओर आगे बढ़ गये।
    (३) उधर हाटक देश के बाद मानसरोवर के निकट ही गन्धर्वों का देश था। इस देश को भी जीतकर गन्धर्वों से तित्तिर-किल्मिष और मण्डूक-नामक घोड़े कर-स्वरूप उन्होंने ग्रहण किये।
    (४) इससे उत्तर जाने पर उन्हें हरिवर्ष मिला। यहाँ महाकाय, महावीर्य द्वारपालों ने इनकी गति अनुनय-विनय करके रोक दी। उन लोगों ने कहा कि यहाँ मनुष्यों की गति नहीं, यहाँ उत्तर-कुरु के लोग रहते हैं; यहाँ कुछ जीतने योग्य चीज़ भी नहीं। यहाँ प्रवेश करने पर भी, हे पार्थ, तुम्हें कुछ भी नज़र नहीं आयेगा और न मनुष्य तन से यहाँ कुछ दर्शनीय ही है। उन लोगों ने पुनः पार्थ की मनोवाञ्छा की जांच की। पार्थ ने कहा कि मैं केवल धर्मराज युधिष्ठिर के पार्थिवत्व का स्वीकार चाहता हूँ। इसलिये युधिष्ठिर के लिये कर-पण्य की आवश्यकता है। यह सुनकर उन लोगों ने दिव्य-दिव्य वस्त्र, क्षौमाजिन तथा दिव्य आभरण दिये।

    स श्वेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य वीर्यवान्। देशं किम्पुरुषावासं द्रुमपुत्रेण रक्षितम्॥
    महता सन्निपातेन क्षत्रियान्तकरेण ह। अजयत्पाण्डवश्रेष्ठः करे चैनं न्यवेशयत्॥
    तं जित्वा हाटकं नाम देशं गुह्यकरक्षितम्। पाकशासनीव व्यग्रः सहसैन्यः समासदत्॥
    सरो मानसमासाद्य हाटकानभितः प्रभुः। गन्धर्वरक्षितं देशमजयत् पाण्डवस्ततः॥
    तत्र तित्तिरकिल्मिषान् मण्डूकाख्यान् हयोत्तमान्। लेभे स करमत्यन्तं गन्धर्वनगरात्तदा॥
    उत्तरं हरिवर्षन्तु स समासाद्य पाण्डवः। इयेष जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनः॥
    तत एनं महावीर्या महाकाया महाबला । द्वारपालाः समासाद्य हृष्टा वचनमब्रुवन्॥
    पार्थ नेदं त्वया शक्यं पुरं जेतुं कथञ्चन । उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत॥
    न चात्र किञ्चिज्जेतव्यमर्जुनात्र प्रदृश्यते । उत्तराः कुरवो ह्येते गात्रयुद्धं प्रवर्तते॥
    प्रविष्टोऽपि हि कौन्तेय नेह द्रक्ष्यसि किञ्चन । नहि मानुषदेहेन शक्यमत्राभिवीक्षितुम्॥
    ... पार्थिवत्वं चिकीर्षामि धर्मराजस्य धीमतः।..युधिष्ठिराय यत्किञ्चित् करपण्यं प्रदीयताम्॥
    ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च। क्षौमाजिनानि दिव्यानि तस्य ते प्रददुः करम्॥
    -- (महाभारत, सभापर्व)
    कालिदास और मेघदूत
    कालिदास के बतलाये हुये मेघ की राह में मिलने वाले प्रायः सभी नद-नदी, गिरि और नगर का पता आज चल गया है। कनखल यानी हरिद्वार तक या कैलाश तक तो हम मान जाते हैं, परन्तु इसके उत्तर गन्धर्वों की नगरी अलकापुरी को हम कोरी कल्पना समझते हैं। कम-से-कम हम इतना मानने को तैयार नहीं होते कि यह भी भौगोलिक सत्य है। अर्जुन श्वेत-पर्वत यानी हिमालय पार कर उत्तर की ओर बढ़े; परन्तु इसे हम कवि-कल्पना से बढ़कर और कुछ मानने के लिये अभी तैयार नहीं। यह मेघ की राह तो और भी कल्पना है। परन्तु इसके पूर्व हम यह दिखलाना चाहेंगे कि बौद्ध लोग किस प्रकार हिमालय के उत्तर-प्रदेशों से अपना सम्बन्ध रखते हैं। बिहार-नेशनल-कालेज के प्रिन्सिपल श्रीयुत् देवेन्द्रनाथ सेन् एम्.ए., आई.ई.एस्. ने अपने Trans-Himalayan-Reminiscences in Pali-literature नामक निबन्ध में यह बहुत ही अच्छी तरह से दिखलाया है कि बौद्धों का प्रभाव हिमालयोत्तर-प्रदेश में ही इतना अधिक क्यों पड़ा तथा बौद्ध लोग मानसरोवर के निकटवर्ती प्रदेशों के ही इतने प्रेमी क्यों हुये । उन्होंने बौद्ध जातकों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि भारतीय आर्यों का प्रेम हिमालयोत्तर-प्रदेश से कुछ नैसर्गिक-सा था। हम उनके निकाले हुये निष्कर्ष को अस्वीकार नहीं कर सकते।
    गर्ग-संहिता और भारतीय इतिहास
    महाभारत के पश्चात् के इतिहास का दिग्दर्शन गर्गाचार्य ने अपनी गर्ग-संहिता में किया है। ऊपर लिखा जा चुका है कि श्रीयुत के. पी. जायसवाल ने Behar & Orissa Research Society के Journal में, गर्गसंहिता के ‘युग-पुराण’ नामक अध्याय के आधार पर, किस प्रकार जनमेजय से लेकर ख्रीष्टाब्द से दो शताब्दी पूर्व तक के इतिहास का दिग्दर्शन कराया है। गर्गाचार्य ने कृष्णा (द्रौपदी) की मृत्यु के बाद से भारतीय इतिहास लिखा है। उनके इतिहास की परिपुष्टि प्राचीन मुद्राओं, विदेशी विद्वानों के रेकर्ड तथा स्वतन्त्र प्रमाणों से भी होती है। उन्होंने जनमेजय और ब्राह्मणों के बीच वैमनस्य का जिक्र किया है। दूसरी बात, जो गर्ग-संहिता से विदित होती है, यह है कि महाभारत के बाद धीरे-धीरे ब्राह्मण धर्म का केन्द्र तक्षशिला से हटकर मगध के पाटलिपुत्र में आ गया। जनमेजय की राजधानी तक्षशिला है और उसकी ब्राह्मणों से शत्रुता है।
    महाभारत के बाद वैदिक धर्म
    महाभारत के बाद अवश्य ही ब्राह्मण धर्म यानी वैदिक धर्म के विरुद्ध आन्दोलन उठने का संकेत पाया जाता है। ऐसा क्यों हुआ, यह उस समय का इतिहास ही बतला सकता है। हिन्दू प्रणाली के अनुसार महाभारत का समय ख्रीष्टाब्द से ३,००० वर्ष के लगभग पहले माना जाता है और यह समय पाकर सत्य भी साबित हो सकता है। हमें विदित ही है कि ख्रीष्ट से पूर्व सातवीं शताब्दी के मध्य में बुद्धदेव और महावीर-जैन का उदय हुआ। स्वभावतः इस धार्मिक क्रान्ति के सफल होने में २,४०० वर्ष का समय बहुत नहीं है। वैदिक काल से ही हमारे धार्मिक विचार में परिवर्तन होते आये हैं और हिन्दू दर्शन के क्रमिक विकास का भी हमें पता मिल जाता है। तब वैदिक काल के अनेकेश्वरवाद से (जिसमें एकेश्वरवाद का बीज-वपन हो गया है) उपनिषत्काल के एकेश्वरवाद तक हम आ जाते हैं। एकेश्वरवाद के बाद हमें ब्रह्मवाद मिलता है, जिससे वेदान्त की उत्पत्ति हुई। इस ब्रह्मवाद में मायावाद सम्मिलित है। संसार माया का जाल और ब्रह्म ही एक सत्य समझा जाता है। परन्तु इसी ब्रह्मवाद और मायावाद की धूम के बाद पुरुष और प्रकृति-वाद का आन्दोलन जाग्रत् हो जाता है। ब्रह्म पुरुष और माया प्रकृति बन जाती है। इस विचार विकास में पर्याप्त समय लगा होगा। आते-आते सूत्रकाल में हमें कपिल का सांख्य-सूत्र मिलता है। यद्यपि सांख्यकारिका सांख्यधर्म के उदय के बहुत दिनों के बाद एक विशिष्ट दर्शन के रूपमें प्रकट हुई, तथापि हम इसे कम-से-कम बौद्ध धर्म से ५-६ सौ वर्ष पूर्व समय देने में कोई आपत्ति नहीं समझते। मैकडानेल्ड महोदय भी ख्रीष्टाब्द से १,००० वर्ष पूर्व सांख्यधर्म का उदय होना तो कम-से-कम स्वीकार ही करते हैं। सांख्य के आधिभौतिक धर्म को हम बौद्धों या जैनों के धर्म का मूल -कारण समझते हैं। कपिल अपने विचार के कारण नास्तिक समझे गये। धीरे-धीरे ४०० वर्षों तक नास्तिकता का, जैसा कि उस समय समझा गया, विकास होता गया। इन्हीं चार-सौ वर्षों में चार्वाक आदि का भी प्रादुर्भाव हुआ। अथर्व-काल के बाद हमें तन्त्र-धर्म का भी सूत्रपात होते देख पड़ता है। धीरे-धीरे यह तन्त्रवाद ज़ोर पकड़ता गया और वैदिक धर्म का रूप विकृत होता गया। यही तन्त्रवाद सम्भवतः शाक्त-धर्म का मूल-कारण रहा। गौतम बुद्ध के समय तक साधारण जनमानस में हिंसा का पूर्णतः प्रचार हो गया होगा।
    महाभारत के बाद बौद्धकालीन इतिहास का अदर्शन
    परीक्षित के पुत्र जनमेजय के समय से ही ब्राह्मणों के विरुद्ध दुर्भाव फैलने लगे, और यही कारण है कि तक्षशिला छोड़कर ब्राह्मणधर्मावलम्बी आर्य मगध की ओर आ गये। गर्ग-संहिता के आचार्य गर्गजी ब्राह्मणधर्म का अनुयायी होने के कारण अवश्य ही बौद्ध या उसके पूर्व के इतिहास का दिग्दर्शन कराने से बाज़ आये से मालूम पड़ते हैं। सच पूछिये, तो संस्कृत साहित्य ही इस विषय में बिल्कुल चुप है। वह अवश्य ही परस्पर विद्रोह और अशान्ति का समय रहा होगा। गर्ग के सामने अवश्य ही ऐतिहासिक ग्रन्थ मौजूद रहे होंगे; परन्तु उन ग्रन्थों में नास्तिकों की कथा न लिखी गयी हो, यह सम्भव प्रतीत होता है। फलतः बौद्ध साहित्य के अनुशीलन के बिना भारतीय इतिहास का पूरा पता नहीं पा सकते।
    बौद्ध जातकों में हिमालयोत्तर-प्रदेश
    फिर भी हम प्रसङ्गानुसार बौद्ध जातकों में आये हुए हिमालयोत्तर-प्रदेशों का वर्णन करेंगे। यद्यपि ये गल्पवत् प्रतीत होते हैं, तथापि हम उत्तर कुरु के सच्चे अस्तित्व का पता पा जाते हैं। ’मिलिन्दपन्ह’ में ’सागल’ नगर की उत्तर-कुरु से तुलना की है, जैसे-’उत्तरकुरु संकासं सम्पन्न सस्यं’। विधुर पण्डित के जातक में भी हम उत्तर-कुरु के दक्षिण में जम्बूद्वीप को पाते हैं। स्मरण रखना चाहिये कि यहाँ पर जम्बूद्वीप ख़ास भारत समझा गया। जैसे-

    पुरतो विदेहे पस्स गोयानिये च पच्छतो करुयो। जम्बूदीपञ्च पस्स मणिम्हि पस्स निमित्तं॥
    इसके अनन्तर फिर भी हम निम्न-लिखित वाक्य मिलता है-

    विदेहेति पुव्वविदेहं गोयानिर्यति अपरगोयानिदीपं; कुरयो ति उत्तरकुरु च दक्षिणतो जम्बूदीपञ्च।
    अर्थात् विदेह पूर्व-विदेह को, गोयानिर्य अपरगोयानि-द्वीप को, कुरु उत्तर-कुरु को और उसके दक्षिण जम्बूद्वीप को कहते हैं। इससे उत्तर-कुरु का हिमालय से उत्तर होना सिद्ध हुआ। इस उत्तर-कुरु के बासिन्दे भी जम्बूद्वीप (भारत के अर्थ में) के बासिन्दों से अच्छे समझे गये हैं। जैसे-
    तीहि भिक्खवे ठानेहि उत्तरकुरुका मनुस्सा देवे च तावतिंसे अधिगण्हन्ति जम्बूदीपके च मनुस्से। कतमेति तीहि ? अमना च, अपरिग्गहा, नियतायुका, विसेसभुजो।
    अर्थात् तीनों बातों में उत्तर-कुरु के मनुष्य और तावतिंस के देव जम्बूद्वीप के मनुष्यों से भिन्न हैं। वे तीन कौन-कौन सी ? वे निर्मम हैं यानी मायारहित हैं, परिग्रह नहीं लेते, अमर हैं तथा कोई विशेष भोजन खाने वाले हैं।
    मानसरोवर या अनोतत्तमहासर
    श्रीयुत देवेन्द्रनाथ सेन ने ’पालीसुत्त’ के आधार पर अनोतत्तमहासर का मानसरोवर होना साबित किया है। पाली-सूत्रों में सात नदियों का वर्णन पाया जाता है; जैसे-अनोतत्त, सिंहपपात, रथकार, कण्णमुण्ड, कुणाल, छ्द्धन्त और मन्दाकिनी। हिमालय से निकली नदियाँ गंगा, यमुना, अचिरावती, सरभू और मही है। ’सरभू’ सम्भवतः सरयू और अचिरावती वैदिक काल की सदानीरा है। मही उत्तर बिहार की एक प्रसिद्ध नदी है। अनोतत्त का अर्थ अनवतप्त है। सूत्रों के अनुसार यह झील उत्तर-कुरु में है; क्योंकि उत्तरकुरु में बोधिसत्त्व और बौद्ध भिक्षु लोग भिक्षाटन कर, अनोतत्त दह में विश्राम करते थे।
    कीथ और मैकडानेल्ड की सम्मति
    The Uttar Kurus who play a mythical part in the epic and later literature, are still a historical people in the ऐतरेय ब्राह्मण where they are located beyond the Himalayas (परेण हिमवन्तम्). In another passage, however, the country of the Uttar Kurus is stated by Vashishtha Satyahavya to be a land of Gods (देवक्षेत्र), but जानन्तापि अत्याराति was anxious to conquer it, so that it is still not wholly mythical.-Keith.
    The territory of the Kuru Panchal is declared in the ऐतरेय ब्राह्मण to be the middle country (मध्यदेश). A group of the Kuru people still remained further north-the Uttar Kurus beyond the Hiamlayas. It appears from a passage of the शतपथ ब्राह्मण that the speech of the Norherners-that is presumably the Norhern Kurus-and of the Kuru Panchal was similar and regarded as specially pure. There seems little doubt that the Brahmanical culture was developed in the country of the कुरुपाञ्चाल and that it spread then east, south and west-Macdonald.
    स्पष्ट है कि उत्तर-कुरु हिमालय के उत्तर में है और ऐतरेय ब्राह्मण के समय में यह एक ऐतिहासिक प्रदेश रहा है, जहाँ से और कुरुपाञ्चाल से प्रत्यक्ष सम्बन्ध था। सम्भवतः कुरुपाञ्चाल-निवासी उत्तर-कुरु के ही वंशधर और शाखा हैं। इस उत्तर-कुरु का भौगोलिक विकास हमारे इतिहास के लिये परम आश्चर्यजनक और महत्त्व की चीज़ है। इससे आर्यों का क्रमशः उत्तरीय ध्रुव के प्रदेशों से आते-आते सिन्धु-नदी के तटवर्त्ती प्रदेश की राह से भारतवर्ष अर्थात् जम्बूद्वीप में आना सिद्ध होता है। आर्यों के हिमालय की तराई से आने के लिये कई मार्ग हो सकते हैं। यह काश्मीर से तिब्बत (त्रिविष्टप) तक विस्तीर्ण है। इस संकटापन्न मार्ग का संकेत हमें ऋग्वेद के सूत्रों से भलीभाँति मिल जाता है। इरानी आर्य कहाँ से भारतीय आर्यों से विलग हुये, यह आगे बतलाया जायगा। हमारा साहित्य हिमालयोत्तर प्रदेश की पुण्य-स्मृतियों से ओतप्रोत है। कभी किसी का ध्यान काबुल की ओर नहीं गया। क्यों ? यह हम उपसंहार भाग में दिखलाएँगे। स्वर्ग के अस्तित्व की धारणा हमारे मन से अभी तक नहीं गयी है। यह हमारी विकट भूल होगी, यदि हम इस प्रत्यक्ष ऐतिहासिक तथ्य को खुले दिल से स्वीकार न करें।
    बौद्ध धर्म के हिमालयोत्तर-प्रदेश में प्रचार का नैसर्गिक कारण
    दूसरी बात जिसे भूलने की सामर्थ्य नहीं, यह है कि बौद्ध धर्म का प्रचार हिमालय से उत्तर ही व्यापक रूप में हुआ। इस नैसर्गिक प्रचार का मूल कारण भी नैसर्गिक हो सकता है। चीनी यात्री फ़ाहियान और हुएनसांग के वर्णन इसके लिये पर्याप्त हैं। फ़ाहियान को, भारत में प्रवेश के पूर्व, खोटन आदि स्थानों में बौद्ध धर्म का पूर्णतः प्रचार मिला। हीनयान-पन्थ के हज़ारों भिक्षु उत्तर की ओर गये। शेनशेन में हीनयान और खोटन में महायान-सम्प्रदाय का प्रचार पाया गया। सर्वत्र संस्कृत और पाली का बोलबाला था। हुएनसांग को, जो गोबी (ओकिनि अर्थात् अग्नि) की मरुभूमि से आया, भारतीय लिपि से ही मिलती-जुलती लिपि गोबी के आसपास के प्रदेशों में मिली। बुद्धदेव की मूर्ति, संघाराम तथा अनेक मन्दिर भी मिले। वह अक्षु से होता हुआ आक्सस की तराई में आया और वहाँ से बल्ख़ चला गया। यह बल्ख़ अपने मन्दिरों की बहुलता के कारण राजगृह कहा जाता था। आश्चर्य नहीं, यदि सर आरेलस्टेन को खोटन की बालुका के अन्दर संस्कृत और प्राकृत के गड़े हुए ग्रन्थ मिले। उधरके शहरों के नाम तक संस्कृत और प्राकृतमय हैं। प्रिन्सिपल सेन के अनुसार यह भारतवर्ष से पूर्व तुर्किस्तान के परस्पर-संसर्ग का अचूक सम्भवनीय प्रमाण है। यह संसर्ग वैदिक सभ्यता से भी पूर्व का होगा।
    ईरानी आर्यों की शाखा कब और कहाँ से अलग हुई?
    अब हम अपनी लक्ष्य-पूर्ति के लिये उन आर्यों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं, जो भारतीय शाखा से अलग हो ईरान की ओर चले गये। हम ऊपर कह चुके हैं कि भारतीय आर्य उस स्मरणातीत समय में अलग हुए, जब उनके वैदिक देवताओं की संख्या बहुत बढ़ने नहीं पायी थी। ’आर्यानां व्रजः’ कहाँ है-इसका स्पष्टीकरण ही इन दोनों शाखाओं के अन्तिम मिलन का इतिहास होगा। वे अवश्य ही उस समय विलग हुए, जब वे ’आर्यानां व्रजः’ में रहते थे। सेन महोदय ने आक्सस-नदी के कहीं पश्चिमोत्तर-प्रदेश में इसका होना बतलाया है। अतएव यह कैस्पियन या कश्यप सागर के दक्षिण-पूर्ववर्त्ती प्रान्त में कहीं हो सकता है। ज़ेन्दावेस्ता के भौगोलिक वर्णन से यह बात स्पष्ट हो जायगी। किन्तु भौगोलिक वर्णन के पूर्व यह निश्चय कर लेना उचित है कि आर्यों के इस परस्पर वैमनस्य का कारण क्या हो सकता है।
    दिति और अदिति की कथा तथा आर्यों का परस्पर संघर्ष
    कश्यप ऋषि की दो पत्नियों से दैत्यों और आदित्यों की उत्पत्ति की कथा सबको विदित है। बहुत सम्भव है, कश्यप-सागर के आसपास ही कश्यप ऋषि का रहना हुआ हो। दैत्य और आदित्य की कथा में देवासुर-संघर्ष का आभास मिल जाता है। पारसियों के इष्टदेव ज़ोरोस्टर को ज़ेन्दावेस्ता में ’मंथ्रन’ कहा गया है। आर्यों के प्राचीन इष्टदेव पारसी और भारतीय आर्यों के बिलकुल एक ही हैं। ज़ोरोस्टर ने आर्यों से मतभेद होते ही देव-पूजक आर्यों के विरुद्ध बग़ावत शुरु कर दी। ऋग्वेद के प्राचीन सूक्तों में सुर और असुर की भिन्नता न होने पर पीछे यह भेदभाव बहुत प्रबल हो गया है। असुरों के विरुद्ध देवदल और देवदल के विरुद्ध असुरदल पीछे प्रकट हो गये हैं। आश्चर्य तो यह है कि जिस तरह फ़ारस यानी ईरान में देव का अर्थ राक्षस हो गया है, उसी प्रकार भारतवर्ष में भी असुर का अर्थ राक्षस ही समझा जाता है ! मुसलमानों के "हिन्दू" शब्द की व्याख्या में भी यही भेदभाव सन्निहित पाया जाता है, जिसका अर्थ वे कुछ और ही करते हैं। कम-से-कम इतना तो निश्चित है कि भारतीय तथा पारसी आर्य किसी बड़ी बात को लेकर ही एक दूसरे से ज़ुदा हुए। धार्मिक विकास अधिकतर भारतीय आर्यों के ही द्वारा हुआ। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय शाखा का झुकाव इस ओर अधिक था तथा उनकी विचारधारा दिन-दिन आगे की ओर बढ़ती गयी। चाहे ये दोनों दल आक्सस-नदी के आसन्न प्रान्तों से विलग हुए हों चाहे और किसी स्थान से, परन्तु वे अलग हुए विकट वैमनस्य के बाद ! यह बात तब और भी पुष्ट हो जाती है, जब हम देखते हैं कि दोनों शाखाओं के मार्ग दो हो गये। ईरानी शाखा को सहज मार्ग मिला और भारतीय शाखा को पहाड़ी प्रदेशों की शरण लेनी पड़ी। ऋग्वेद की एक-एक पंक्ति से, पथ की दुर्गमता दूर करने के लिये, एक आहभरी दीन प्रार्थना प्रकट होती है। भारत में आ जाने पर आर्यों को ऐसी कठिनाई नहीं थी कि उन्हें पग-पग पर अत्याचारी शत्रुओं के नाश के लिये इष्टदेवों की दुहाई देनी पड़ती। अत्याचार-प्रिय अन्य शाखा से हार मानकर ही इन्हें यह मार्ग पकड़ना पड़ा होगा।
    अवेस्ता से भौगोलिक ज्ञान तथा उससे ईरानी शाखा के इतिहास पर प्रकाश
    यह निश्चित करने के पूर्व कि आर्य लोग उत्तर की ओर से दक्षिण की ओर हिमालय के मार्ग से आये और आर्यावर्त्त के कुरुक्षेत्र तक फैलते-फैलते अपने प्राचीन उत्तर-कुरु की स्मृति में कुरुक्षेत्र का उद्घाटन जम्बूद्वीप में किया, यह जान लेना जरूरी है कि ईरानी शाखा किस मार्ग से यहाँ आकर बसी और कालान्तर में उसकी स्थिति और मनोवृत्ति कैसी रही। अहुर (असुर) मज़्द ने, जो ईरानी शाखा के ज़ोरोस्टर-सम्प्रदाय के नायक थे, १६ प्रदेश बसाये थे, जिनमें निम्नलिखित प्रदेशों का आधुनिक प्रदेशों से मिलान हो चुका है-
    ज़ेन्द-नाम आधुनिक नाम १-आर्यानेम वेजो सं. आर्यानां व्रजः (आक्सस के निकट) २-सुग्ध (Sugdha) सग्ध (समरकन्द) ३-मौरू (Mouru) मर्व (Marv) ४-बख्धी (Bakhdhi) बल्ख (Balkha) ५-हेरोयू (Haroyu) हेयर (Hare) या हेरात ६-हफ़्तहिन्दु सप्तसिन्धु (पंजाब) (Fargard I, of the Vendidad)
    ऊपर की तालिका से स्पष्ट है कि ईरानी शाखा भारतीय शाखा से अलग हो पहले पहल ’आर्यानां व्रजः’ (Aryanem vaejo) में ही रही। इसका अर्थ है कि आर्यों की भूमि। इस नामकरण से यह स्पष्ट है कि वे भी आर्य-शब्द की स्मृति में अपने वासस्थान का नाम रखना पसन्द करते थे। यह व्रज Vanguhi Daliya पर बसा हुआ समझा जाता है। यह नदी आक्सस-नदी के कहीं उत्तर-पश्चिम की ओर थी। इसके बाद वे लोग क्रमशः समरकन्द, मर्व, बल्ख, हेरात, काबुल और सप्तसिन्धु अर्थात् पंजाब की ओर बढ़ते गये। इस भौगोलिक वर्णन में एक बात, जिस पर हमें विचार करना है, यह है कि जिस प्रकार हमारे साहित्य में मेरु या उत्तर-कुरु से आरम्भ कर किम्पुरुषवर्ष आदि होते हुये हिमवन्त और जम्बूद्वीप का क्रमिक सम्बद्ध वर्णन है, उसी प्रकार और ठीक उसी प्रकार ईरानियों की गति का सिलसिला भी पाया जाता है। किसी भी सुधी को एक नज़र डालने से यह स्पष्त विदित हो जाता है कि दोनों शाखाओं के दो भिन्न-भिन्न मार्ग हैं; दो भौगोलिक सम्प्रदाय हैं; दोनों के वियोग के अनन्तर भिन्न-भिन्न देवता हैं ! एक बात और; ’आर्यानां व्रजः’, Celestial Mountain (स्वर्गीय पर्वत)-जिसका नाम Thianshan भी है-के ठीक निकटवर्त्ती प्रदेश हैं। दोनों शाखाओं के विद्रोह पर दृढ़ विश्वास तब और भी हो जाता है, जब हम यह देखते हैं कि इन्द्र, जो भारतीय शाखा के आराध्य देव हैं, पारसियों के लिये एक दुर्दान्त दैत्य हैं। ऋग्वेद की ऋचाएँ इसकी साक्षी हैं। इन्द्र, जिनके आर्य लोग बड़े कृतज्ञ हैं, बारबार अपनी वीरता की प्रशंसा सुनते हैं। उन्होंने असुरों का दल-बल नष्ट कर आर्यों की सहायता की है। देव और असुरों की लड़ाई में वह सदा अग्रसर रहते हैं। इन्द्र इन्हीं स्वर्गीय पर्वतों पर रहते थे। सुमेरु-पर्वत का निर्देश हमें Thianshan या Celestial या स्वर्गीय पर्वतों में मिल जाता है। अवश्य ही सुर और असुरों का यह घोर युद्ध ईरान के पूर्वी सीमा-प्रान्त में हुआ होगा। Vendidad के वर्णनानुसार मर्व (Merv) पापपूर्ण और नष्ट-भ्रष्ट हो गया था। इसी प्रकार निशय (Nisaya) जो मर्व और बल्ख के अन्तर्गत था, पाप और नास्तिकता का परिपोषक था, हेरात अश्रुपात और विकल वेदना से परितप्त था; और Vaekereta या काबुल में बुतपरस्ती बढ़ रही थी, तथा किरिसस्प (Keresaspa) देवपूजक बन गये थे।
    ये दोनों शाखायें कब और कहाँ अलग हुईं, इसका ठीक-ठीक अंदाज़ा करना कठिन है; परन्तु इतना अनुमान किया जा सकता है कि आक्सस के दक्षिण और थियानशान या मेरु-पर्वत-माला के निकटवर्ती प्रदेशों में कहीं इनके दो दल हुए। इन्द्र भारतीय शाखा के प्रमुख जान पड़ते हैं। अहुरमज़्द के नेतृत्व में दूसरा दल रहा होगा। एक का दूसरे को विधर्मी समझना तथा एक का दूसरे के इष्टदेव को दैत्य बनाना धार्मिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा है। अस्तु, ज़ेन्दा अवेस्ता ’आर्यानां व्रजः’ से मर्व, बल्ख, ईरान, काबुल और सप्तसिन्धु का निर्देश देता है। इससे यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ईरानी शाखा यानी पारसी, आर्यों से विलग हो, ईरान की अधित्यका को तय करते हुए काबुल की राह से सप्तसिन्धु तक फैल गये। भारतीय शाखा भी काबुल की राह से आयी, यह अत्यन्त ही सन्देहास्पद सिद्धान्त है। जब हम देखते हैं कि ज़ेन्दावेस्ता अपने भूगोल का मानचित्र इस प्रकार खींचता है तथा वैदिक साहित्य का काबुल से ही अपना बयान प्रारम्भ कर पूर्व की ओर बढ़ता है, तब हम दो ही निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं- एक तो यह कि आर्य लोगों के सप्तसिन्धु से ही दो दल हो गये और ईरानी शाखा सप्तसिन्धु से पश्चिमोत्तर-प्रदेश की ओर बढ़ चली। और, दूसरे यह कि भारतीय शाखा उत्तर की ओर से सीधे सिन्धु-नदी की राह से आयी तथा सप्तसिन्धु में फैलकर पूर्व की ओर बढ़ने लगी। इसी बीच में, जब कि पामीर, काराकोरम और सिन्धु के मार्ग से काबुल तक फैल गयी, ईरानी शाखा भी पूर्व निर्दिष्ट मार्ग से काबुल तक फैल गयी। सम्भवतः यहाँ फिर उनकी ईरानियों से मुठभेड़ हो गयी। दोनों शाखाओं का लक्ष्य सप्तसिन्धु की ओर ही था, यह एक सन्देह की बात हो सकती है; परन्तु हम ज़रा अधिक विचार करके देखते हैं, तो साफ़ प्रकट हो जाता है कि दोनों दल के विस्तार के लिये दूसरा कोई क्षेत्र नहीं था। थियानशान के पूर्व थोड़ी ही दूर पर गोबी की मरुभूमि दीख पड़ती है। उस समय इस मरुभूमि का क्या रूप था, सो तो ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता; परन्तु या तो यह समुद्र था या जैसा कुछ भूतत्त्वविशारदों का कथन है, या यह पहाड़ी-धूसरित चट्टानों की राशि थी। भूतत्त्ववेत्ताओं का कथन है कि साइबेरिया जिस अवस्था में आज है, उसी अवस्था में कभी मध्य-एशिया का यह भाग रहा होगा। साइबेरिया में प्राचीन कालीन वन के चिह्न मिलते हैं और ऐसा अनुमान किया जाता है कि किसी समय इसकी आबोहवा ऐसी थी कि मनुष्य यहाँ रह सकते थे। तात्पर्य यह कि भारतीय शाखा को सिवा मानसरोवर से जाकर तिब्बत तक फैलने के दूसरा कोई चारा नहीं था। सम्भवतः वे भारतवर्ष में एक ही बार नहीं आये, अपितु समय समय पर अपनी सुविधानुसार आते रहे।
    ऋग्वेद के सूक्तों में ईरान की अधित्यका या काबुल के पश्चिमी प्रदेशों का आभासन मिलकर हिमालयोत्तर-प्रदेश की स्मृति का आभास मिलता है-ऋग्वेद के अध्ययन से इस बात का पता चल जायगा कि जिन प्राकृतिक दृश्यों को देखकर आर्य-ऋषि मन्त्रमुग्ध हो अपनी सरल परिमार्जित कविता की अंजलि समर्पित करते थे, वे प्राकृतिक दृश्य हिमवन्त के इस पार या उस पार ही सुलभ हैं। उन स्तुतिपूर्ण कविताओं में वे प्रकृति का दृश्य खींचते तथा अपने मंगल और विभव की अभ्यर्थना करते हैं। लोकमान्य जिन सूक्त या ऋचाओं के आधार पर आर्यों को हिमालयोत्तर-प्रदेशों के आदि-निवासी बताते हैं, वे सूक्त उनकी स्मृति के जीते जागते चित्र हैं। सम्भवतः आज कोई भी लो. तिलक के सिद्धान्तों का खण्डन सफलतापूर्वक नहीं कर सकता। चाहे आर्य पहले-पहल उत्तर ध्रुव के निकटवर्ती वृत्त के निवासी रहे हों चाहे और इधर आकर साइबेरिया के मैदान में बसे हों, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि वे आये उसी दिशा से और अन्त तक, आर्यावर्त में बस जाने तक, अपनी पुण्य-स्मृति को ताज़ा रखते गये। उत्तर-कुरु के भौगोलिक निर्देश से यह स्पष्ट ही प्रकट हो जाता है कि आर्य लोग अन्त तक ’कुरु’ शब्द से प्रेम रखते गये। आर्यों का यह ऐतिहासिक और भौगोलिक सिलसिला ठीक उतना ही सत्य है, जितना उनका प्राकृतिक दृश्यों का मनन कर दर्शन और ज्योतिष-शास्त्र का विकास करना। ऋग्वेद के कौन सूक्त कब रचे गये, यह सन्दिग्ध होने पर भी यह कहा जा सकता है कि कौन सा सूक्त किस विषय को निर्दिष्ट कर रहा है। हम नीचे उन सूक्तों को देते हैं, जिनकी व्याख्या तिलक के बाद सभी वैदिक विद्वान् करने लगे हैं-

    अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृशे कुहचित् दिवेयुः ?
    अद् वधानि वरुणस्य व्रतानि विचाकशत् चन्द्रमा नक्तमेति।

    अर्थात् वे ऋक्ष (सप्तर्षि), जो उच्च गगन-मण्डल में स्थित हैं, रात में देखे जाते हैं। वे दिन में कहाँ चले जाते हैं ? वरुण के कामों को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। उन्हीं की आज्ञा से चन्द्रमा रात में चान्दनी देते हैं।
    यह ऋचा उस समय बनी होगी, जब आर्य लोग उत्तर-ध्रुव के प्रदेशों से हटकर बहुत इधर आ गये होंगे। तिलक महोदय ने ऋचाओं के बल पर यह दिखलाया है कि वे जहाँ रहते थे, वहाँ एक ही तारा (उत्तर-ध्रुव) बराबर प्रकाशित था, जहाँ दिन कम और रात बहुत बड़ी होती थी। यह उत्तरीय प्रदेशों का चित्र है। उपर्युक्त ऋचा वहीं बनी , जहाँ दिन-रात क्रम से होते रहे होंगे, और चन्द्रमा का भी उदय होता होगा। पवेपयन्ति पर्वतान् विविञ्चन्ति वनस्पतीन्। प्रो आरत मरुतो दुर्मदा इव देवासः सर्वथा विशा॥ अर्थात् पर्वतों को हिलाते हुए, वृक्षों को गिराते हुए, हे मरुतो ! तुम मदमत्त देवों की भाँति अबाध रूप से चलते हो।

    दासपत्नीरहिगोपा अतिष्ठत् निरुद्धा आपःपणिनेव गावः।
    अपां विलमपि हितं यदासीत् वृत्रं जघन्वा अप तत् ववार॥

    अर्थात् पणि द्वाराछिपायी गायों की भाँति जल वृत्रा द्वारा जो उनके पति और स्वामी हैं, रोक दिया गया। इन्द्र ने वृत्रा का वध किया और मार्ग स्वच्छ कर दिया, जिससे पानी बह गया, जो वृत्रा द्वारा रोक दिया गया था।
    उपर्युक्त वर्णन ऋषियों का आंखों देखा है। वृत्रा का अर्थ मेघ है। प्रायः पहाड़ी नदियाँ, जो बहुधा सूखी रहती हैं, वर्षा होने पर ज़ोरों से उमड़कर बहने लगती हैं। दूसरी ऋचा से पहाड़ी तूफ़ानों से होनेवाला वृक्ष-कम्पन साफ़-साफ़ नज़र के सामने आ जाता है। यह दृश्य पञ्चनद की समभूमि पर सम्भव नहीं। यह उस समय की स्मृति है, जिस समय आर्य हिमालयोत्तर पहाड़ी प्रदेशों में रहते होंगे। एक दूसरी ऋचा जो ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के १५वें सूक्त में है, स्पष्ट कर देती है कि आर्य लोग सिन्धु नदी के उद्गमस्थान, काश्मीर के पूर्वोत्तर-प्रदेश, मानसरोवर के निकट, पास से पंजाब में आये। यह ऋचा निम्नलिखित है-

    सोदञ्चं सिन्धुमरिणात् महित्वा वज्रेणान उषसः संपिपेव।
    अजवसो जविनीभिः विवृश्चन् सोमस्य ता मद इन्द्रश्चकार॥

    अर्थात् इन्द्र ने अपनी महत्ता से सिन्धु-नदी को उत्तर की ओर बहा दिया तथा उषा के रथ को अपनी प्रबल तीव्र सेना से निर्बल कर दिया। इन्द्र यह तब करते हैं, जब वह सोम मद से मत्त हो जाते हैं। सिन्धु-नदी अपने उद्गम-स्थान मानसरोवर से काश्मीर तक उत्तर-मुँह होकर बहती है; काश्मीर के बाद दक्षिण-पश्चिम-मुखी होकर बहती है। सम्भवतः इन्द्र ने पहाड़ी दुर्गम मार्ग को काटकर, सिन्धु-नदी के संकीर्ण मार्ग को विस्तीर्ण कर उत्तर की ओर नदी की धारा स्वच्छन्द कर दी हो। इससे आर्यों का मार्ग बहुत सुगम हो गया होगा। यह मत निम्नलिखित ऋचा से और भी दृढ़ हो जाता है-

    इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री।
    अहन् अहि मन्वपस्ततर्द प्रवक्षणा अभिनत् पर्व्वतानाम्। (ऋ.मं. १/३२/१)

    अर्थात् इन्द्र के उन पुरुषार्थपूर्ण कार्यों का वर्णन करूँगा जिनको उन्होंने पहले-पहल किया। उन्होंने अहि यानी मेघ को मारा; (अपः) जल को नीचे लाये और पर्वतों को जलमार्ग बनाने के निमित्त काटा (अभिनत्)।
    इसके बाद ही इसी सूक्त की आठवीं ऋचा इस प्रकार है-

    नदं न भिन्नममुया शयानं मनो रुहाणा अतियन्ति आपः।
    याः चित् वृत्रो महिना पर्यतिष्ठत् त्रासामहिः यत्सुतः शीर्बभूव॥ (१/३२/८)

    अर्थात् ठीक जिस प्रकार नदी ढहे हुए कगारों पर उमड़कर बहती है, उसी प्रकार प्रसन्न जल पड़े हुए वृत्र (बादल) पर बह रहा है। जिस वृत्रा ने अपनी शक्ति से जल को जीते-जी रोक रक्खा था, वही (आज) उनके पैरों तले पड़ा हुआ है।
    यह दृश्य पहाड़ी प्रदेशों के दृश्य का स्मरण दिलाता है। वर्षा होने के समय काले-काले बादलों के झुण्ड और पंक्तियाँ, बिजली की चमक, तड़क-भड़क के साथ गर्जन और अन्त में वृष्टिपात होने पर जल की अटूट धारा तथा मेघों का लोप ! ऐसे मनोरम हृदयाकर्षक दृश्य को देखकर-जिसमें मेघ पहाड़ों के सिर पर अड्डा जमाये रहते हैं और बरस जाने पर यत्र-तत्र हलके होकर विलीन हो जाते हैं-आर्यों का यह चित्र खींचना बिलकुल स्वाभाविक है। ऐसी ऋचायें प्रचुर मात्रा में मिलती हैं।

    तुलनात्मक अध्ययन के लिये ईरानी शाखा का गतिक्रम दिया जाता है-
    इरानी आर्योंका वायुपुराण पर्वतश्रेणी महाभारत बौद्धजातक और गतिक्रम Korasea कुरु कुरुवर्ष ऐतरेय ब्राह्मण कास्पियन आक्सस उत्तरसागर शृङ्गवान् (उक्ष, आर्यानां व्रजः) हिरण्मय हिरण्मयवर्ष सुग्ध (समरकन्द) रम्यक श्वेत मौरू (मर्व) Elburz इलावृत रम्यकवर्ष हरिवर्ष (उत्तर कुरु) उत्तर कुरु (मेरु) बख्धी (बल्ख) Thianshan हरिवर्ष नील हेरोयू (हेराट) किम्पुरुष इलावृतवर्ष गन्धर्वदेश मानसरोवर (मानसरोवर) काबुल भारतवर्ष नैषध हाटक अन्यदेश (सप्तसिन्धु) हफ़्तहिन्दु(सप्तसिन्धु) हरिवर्ष किम्पुरुषक्षेत्र हेमकूट श्वेतपर्वत(हिमालय) हिमालय किम्पुरुषवर्ष हिमवान् भारतवर्ष भारतवर्ष भारतवर्ष (सप्तसिन्धु)
    अवेस्ता और ऋग्वेद में आर्यों के आदि-निवास की झलक
    ऋग्वेद और ज़ेन्दा-अवेस्ता (Zenda Avesta) दोनों में उत्तरीय ध्रुव के निकटवर्ती प्रदेशों की लम्बी छः महीने वाली रातों की स्मृति विद्यमान है। लोकमान्य तिलक का उत्तरीय ध्रुव के प्रदेशों को आर्यों का आदि-निवास-भूमि बतलाना तथा ज्योतिर्गणना के आधार पर ख्रीष्टाब्द से हज़ारों वर्ष पूर्व उन ध्रुव-प्रान्तों में आर्यों के रहने का सिद्धान्त ध्रुव-सा ज्ञात होता है। वहाँ से महाप्रलय (The Great Deluge) के उपरान्त Post Glacier Period में वे लोग साइबेरिया के विस्तृत भूभाग में, सम्भवतः आधुनिक यूराल पर्वतश्रेणी से पूर्व और पश्चिम दोनों ओर फैल गये होंगे। भूतत्त्व-विशारदों के कथनानुसार साइबेरिया उस समय अनुकूल बसने योग्य आबोहवा में रहा होगा, जैसा कि उस मैदान के अन्दर पाये जाने वाले पौधों और जन्तुओं के कंकाल से अनुमान किया जाता है। मैंने यूरेशिया का एक मानचित्र अपनी सुविधा के लिये तैयार किया है, जो इस लेख के साथ नहीं दिया गया है। उसमें मैंने प्राचीन और अर्वाचीन नामों की तुलना कर आर्यों की गति का चित्र खींचा है। यह चित्र काल्पनिक होने पर भी लोकमान्य के सिद्धान्त के समर्थन के साथ-साथ पुराण तथा महाकाव्यों में वर्णित भौगोलिक क्रम की पूर्ण परिपुष्टि करता है। इससे स्पष्ट विदित हो जायगा कि पुराणकारों तथा महाकाव्य के रचयिताओं को अपने आदिकालीन सनातन इतिहास और भूगोल का स्मरण था। वे अपने आदि-निवास-स्थल का पुण्य-स्मरण कर उनकी विविध प्रशंसा करते हैं। वे उन स्थानों को पवित्र समझते और वहाँ विविध सुख की कल्पना करते हैं। बौद्ध साहित्य, जिसका इन दिनों ज़ोरों के साथ अध्ययन हो रहा है, इस विषय पर प्रकाश डालता है। हिमालयोत्तर-प्रदेशों तथा पर्वतश्रेणियों के नामों में संस्कृतत्व का आभास मिल जाता है।
    अर्वाचीन और प्राचीन नामों की तुलना से सम्भवनीय स्थान-निर्देश
    मैं उत्तर-ध्रुव से आरम्भ कर, ऐसे शब्द-साम्य का दिग्दर्शन करा आर्यों की प्राचीन स्थिति की एक झलक देखने का प्रयत्न करूंगा। मैंने अपने कल्पित मानचित्र में अर्वाचीन प्रचलित नामों को और जहाँ-तहाँ प्राचीन पौराणिक नामों को अंकित किया है। उत्तर-महासागर (Arctic ocean) के दक्षिण कारासागर और नोवा ज़ेम्बला (Nova Zembla) द्वीप के दक्षिण कोरा का मुहाना है। वायु पुराण के अनुसार कुरु उत्तरतम प्रदेश माना गया है। ब्रह्माण्ड पुराण इसे उत्तर समुद्र के तट ही पर दक्षिण की ओर मानता है। पद्मपुराण कुरु के बदले ऐरावत को उत्तर-समुद्र के दक्षिण और शृङ्गवान्-पर्वतके उत्तर मानता है। यह ऐरावत, पद्मपुराण के अनुसार ऐसा स्थान है जहाँ सूर्य की गति भी नहीं है। अतएव ब्रह्माण्डपुराण का कुरु-वर्ष या उत्तर-कुरु ही पद्मपुराण में ऐरावत हो गया है और पद्मपुराण में, उत्तर-कुरु मध्य-एशिया में आकर मेरु-पर्वत के पास ही उत्तर और नील-पर्वत के पास दक्षिण हो गया है। वायुपुराण का कुरु जम्बूद्वीप का उत्तरतम प्रदेश है; पद्मपुराण में यह भारत और उत्तर ध्रुव के बीच में आ गया है। यह आर्यों के उत्तर की ओर से, महाप्रलय के बाद, एशिया में आने का द्योतक है। मैं वायुपुराण के ’कुरु’, को जो उत्तर-समुद्र के समीप यानी ध्रुव-प्रदेश में है-कारा-सागर (Karasea) और कोरा के मुहाने (Strait of Kora) के आस-पास के स्थलों में मानता हूँ। यह कारा-सागर ही पद्म-पुराण या ब्रह्माण्ड पुराण का उत्तर-समुद्र है। यह कारा-सागर के ठीक दक्षिण है। आजकल जिसे North Sea कहा जाता है, वह योरप के उत्तर है। किन्तु उस समय जब आर्य लोग उत्तर-ध्रुव के निकटस्थ प्रदेशों में रहते थे, कारा सागर ही उत्तर समुद्र का द्योतक हो सकता है। ’कारा’ और ’कोरा’ शब्दों से कुरु शब्द का निकटतम सम्बन्ध भी है।
    शृङ्गवान् , ऐरावत, यूराल नदी या संस्कृत का ’इरालय’
    शृङवान्-पर्वत का पता लगाना कुछ टेढ़ा अवश्य मालूम होता है; परन्तु इसके अर्थ पर ध्यान देने से विदित होता है कि किसी पर्वत को, जिसके शिखर (शृङ्ग) हो, शृङ्गवान् कहा जा सकता है। पद्मपुराण उत्तर-समुद्र के बाद ऐरावत का होना मानता है; और शृङ्ग इसके दक्षिण है, अतएव उत्तर-समुद्र और शृङ्ग (Mammoth Country) के बीच ऐरावत का होना निश्चित हुआ। इस ऐरावत-वर्ष में भी सूर्य की गति नहीं है। ऐरावत शब्द ’इर्’ धातु से बना हुआ है। ’इर्’ और ’इल्’ धातु जाने के अर्थ में प्रयुक्त हैं। अतएव ’इरा’ का अर्थ पृथ्वी भी होता है। जल और सरस्वती के अर्थ में भी इसका प्रयोग हुआ है। इरावत का अर्थ समुद्र और इसी प्रकार इराधर और इलाधर का अर्थ पहाड़ होता है। इरेश का प्रयोग हम वरुण के अर्थ में करते हैं। ऋग्वेद में वरुण की महिमा बहुत गायी गयी है। इन्द्र के समान वरुण भी धीरे-धीरे आर्यों के प्रधान देवता बन गये हैं। इरावत का अर्थ समुद्र होने से, ऐरावत (स्वार्थे अण्) का अर्थ समुद्र-तट का वासी हो सकता है। उत्तरीय ध्रुव के प्रदेशों में सूर्य की गति नहीं है। ऐरावत में भी सूर्य का प्रकाश दुर्बल माना गया है। चूँकि यह ऐरावत-शृङ्ग के उत्तर है, अतएव यूराल-पर्वतश्रेणी के उत्तर-स्थित प्रदेशों को ऐसा मान लेने में कोई अड़चन नहीं जान पड़ती। देखकर आश्चर्य होता है कि उत्तर-ध्रुव से आरम्भ कर मध्य-एशिया के प्रदेश से लेकर फ़ारस या अफ़गानिस्थान और भारतवर्ष की अर्वली-पर्वत-श्रेणी तक ऐसे तत्सम शब्दों का ताँता लगा हुआ है। यही यूराल-पर्वतश्रेणी आर्यों का दूसरा अड्डा हो सकता है। यहीं के आस-पास के स्थान ऐरावत देश के द्योतक हैं। यूराल-पर्वत से ’यूराल’ नाम की एक नदी भी निकलती है। यह नदी कैस्पियन-सागर में गिरती है। ’इरा’ का अर्थ जल होने से इरालय का अर्थ नदी हो जाता है। आर्यों की योरपीय शाखा सम्भवतः यूराल-पर्वत-श्रेणी के आसपास के प्रदेशों से ही अलग हुई।
    इलास्पद, इरास्प (द) और योरप का साम्य
    इसका नाम इलास्पद और इरास्पद दोनों हो सकता है। यदि हम इसी स्थान को इलास्पद या इरास्पद मान लें, तो योरप के नामकरण में भी हमें इरास्प (द) का आभास मिल जाता है। स्वामी दयानन्द ने योरप की तुलना हरिवर्ष से की है। हरि का अर्थ पीत और बन्दर भी है। हरिनेत्र का अर्थ पीली आँखवाला भी है। यह हरिवर्ष योरप का नाम भी हो सकता है; परन्तु प्रिन्सिपल महोदय ने इस हरिवर्ष को पामीर-पर्वत-श्रेणी के उत्तर और थियानशान के दक्षिणवर्ती प्रदेशों के बीच बतलाया है। चूँकि आर्य लोग अपने प्रिय नामों को जहाँ गये, अपने साथ लेते गये, इसलिये हरिवर्ष को योरप मानने में कोई बाधा नहीं। योरपवासियों की नेत्राकृति से भी यह युक्तिसंगत मालूम होता है। पीछे से हरिवर्ष हिमालयोत्तर-प्रदेश हो गया।
    इलावृत और एलबर्ज़ पर्वत का साम्य
    इसके अनन्तर वायुपुराण में हिरण्मयवर्ष का होना बतलाया गया है। हिरण्मय के बाद श्वेत-पर्वत और उसके बाद रम्यक-वर्ष है। रम्यकवर्ष के बाद नीलपर्वत और तत्पश्चात् इलावृत है। हम एशिया के मानचित्र में इन पाञ्च स्थानों का क्रमिक निर्देश करते हुए इलावृत का निर्देश Elburz (एलबर्ज़)-पर्वत से कर सकते हैं। यह एलबर्ज़ कास्पियन-सागर के उत्तर पश्चिम तक फैला हुआ है। इन पहाड़ी प्रदेशों के उत्तर काकेसस पर्वत है। काकेसस पर्वत के निकटवर्ती प्रदेश की भूमि, लोकमान्य तिलक के पूर्व आर्यों की आदि-भूमि मानी जाती थी। यदि एलबर्ज़ के आसपास (कास्पियन-सागर के पश्चिमी किनारे से लेकर दक्षिण-पूर्व तक) आर्यों के इलावृत-देश को मान लें तो काकेसस, जो नील-सागर के उत्तर-पूर्व है, नील-पर्वत का स्थान ग्रहण कर सकता है।
    रम्यकवर्ष और श्वेतपर्वत
    वायुपुराण नीलपर्वत के बाद रम्यकवर्ष का होना बतलाता है। सम्भवतः आर्य लोग ऐरावतवर्ष से दक्षिण की ओर यूराल-नदी के तटवर्ती प्रदेशों से आकर कास्पियन-सागर से उत्तर, काकेसस (नीलपर्वत) से एशियाई टर्की के अरब-सागर (इरा = जल) तक फैल गये हों। यह प्रदेश यूराल पर्वत की तराई होने के कारण सुन्दर है तथा पहाड़ी प्रदेश यहाँ बहुत कम है। बहुत सम्भव है, इस रम्यक-भूमि के उत्तर यूराल की पर्वतश्रेणी में कोई श्वेतपर्वत भी रहा हो। श्वेतसागर (White sea) कोरासागर के पश्चिम की ओर अब तक विद्यमान है। वायुपुराण, ऐरावत के बाद शृंगवान् और शृंगवान् के बाद हिरण्मय वर्ष का होना बतलाता है। यह हिरण्मयवर्ष सम्भवतः यूराल-पर्वतश्रेणी के आसपास ऐरावतवर्ष के दक्षिण-पश्चिम की ओर रहा होगा। अथवा हो सकता है, यह यूराल-पर्वतश्रेणी के पश्चिम से यूराल-नदी के तट तक फैला हुआ हो।
    मध्यएशिया के प्रदेशों में आर्यों का रहना और वहाँ से भारतीय और ईरानी शाखाओं का अलग-अलग होना- इसमें संदेह है कि आर्य लोग रम्यकवर्ष के बाद ऐरल-सागर की ओर से ’आर्यानां व्रजः’ में आये या एलबर्ज़ (इलावर्त) के बाद कास्पियन-सागर केपूर्व की ओर ऐरल-सागर की ओर फैल गये।
    ऐरल-सागर और ऐरावत का साम्य
    ऐरल-सागर के ऐरावत से साम्य होने के कारण संभव है। यूराल-नदी के तटवर्ती प्रदेशों से होते हुए ऐरल की ओर कुछ लोग बढ़ गये हों और कुछ आर्य काकेसस से होते हुए फिर भी समयान्तर में कास्पियन-सागर के पूर्ववर्ती प्रदेशों की ओर आक्सस (अक्षु) नदी के तटों पर ऐरल-सागर तक फैल गये हों। चूँकि आर्यों की दोनों शाखाएँ इसी आक्सस नदी के तटवर्ती प्रदेशों से अलग हुई बतायी जाती हैं और चूँकि ईरानी आर्यों की प्रथम भूमि ’आर्यानां व्रजः’ है, इसलिये ’आर्यानां व्रजः’ का आक्सस-नदी के उत्तर-पश्चिम की ओर होना निश्चित किया गया है। चाहे कहीं भी हो, लेकिन यह प्रदेश ऐरल के दक्षिण, आक्सस से पूर्व-उत्तर और कास्पियन से पूर्व की ओर कहीं रहा होगा; क्योंकि इसके बाद ईरानियों का दूसरा प्रदेश स्रग्ध (समरकन्द) है। भारतीय शाखा ’आर्यानां व्रजः’ से ही ईरानियों से अलग हुई, ऐसा प्रतीत होता है। पूर्वी टर्की में ताजिक (Tajik) -नामक आर्य-जाति का रहना माना जा चुका है। यही पीछे टर्की के पहाड़ी प्रदेशों में जा बसी और वहाँ पर यह आज गल्च (Galch) कही जाती है। आक्सस-नदी ऐरल-सागर से निकलती है और यह निर्विवाद सा है कि दोनों शाखायें आक्सस-नदी के दोनों तटों पर कभी रहती थीं। जब हम टर्की में आर्यों के कभी रहने का पता पाते हैं और जब उनमें भारतीय आर्यों की संस्कृति का आभास मिलता है, तो यह कहना कि आर्य लोग आक्सस-नदी के उस भाग से आये, जो ऐरल-सागर से आरम्भ होकर नदी के पूर्वी तट पर फैला हुआ है, अयुक्तिक नहीं है। ईरानी लोग समरकन्द, बल्ख़ और मर्व की ओर बढ़ते गये और भारतीय आर्यशाखा दक्षिण-पूर्व प्रदेशों की ओर बढ़ती-बढ़ती समय पाकर थियानशान, तारीम और कुएनलन-पर्वतश्रेणी से सिन्धु-नदी के मुहाने तक फैल गयी होगी।
    ईरानी शाखा के विलग होने पर आर्यों का गतिक्रम
    वायुपुराण का भौगोलिक वर्ष-विभाग प्राय़ः पर्वतश्रेणिओं से विभक्त है। हम ऊपर दिखा चुके हैं कि किस प्रकार प्रत्येक वर्ष (Country) पर्वतों या सागरों से सीमाबद्ध है। हम यह भी देखते हैं कि एलबर्ज़-पर्वतश्रेणी से आक्सस-नदी के तट-प्रान्तों तक एक बृहत् मैदान फैला हुआ है, जिसके किसी भाग-विशेष को ही ’आर्यानां व्रजः’ कहना होगा। चूँकि इलावृतवर्ष के बाद वायुपुराण में मेरु-पर्वत का नाम आया है, इससे कहना पड़ता है कि एलबर्ज़-पर्वत से मेरु तक का भूभाग ’आर्यानां व्रजः’ का द्योतक रहा होगा। आक्सस का पश्चिमी किनारा ईरानियों और पूर्वी किनारा भारतीय आर्यों के हाथ में रहा हुआ माना जा सकता है। एलबर्ज़ और मेरु के बीच का भूभाग उस समय उपजाऊ और सुखद रहा होगा तथा आर्यों के संघर्ष का कारण भी यही बना होगा। ईरानी शाखा ने, सम्भवतः ज़बर्दस्त और अपेक्षाकृत अशिक्षित होने के कारण भारतीय शाखा को दक्षिण-पश्चिम यानी ईरान की ओर जाने से रोक दिया हो और भारतीय शाखा को पर्वतीय प्रदेशों की शरण लेने को विवश होना पड़ा हो। यह मेरु-पर्वत कौन सा पर्वत है, यह अभी तक ठीक-ठीक नहीं कहा जा सका है; परन्तु जब हम देखते हैं कि महाभारत में किम्पुरुषवर्ष के बाद हाटक, हाटक के बाद मानसरोवर, मानसरोवर के बाद समीप ही गन्धर्व और गन्धर्व के बाद हरिवर्ष यानी उत्तर-कुरु है, तो हमें कहना पड़ता है कि यह हरिवर्ष थियानशान-पर्वत के दक्षिण और पामीर के पूर्ववर्ती प्रदेश का नाम रहा होगा। इन प्रदेशों के आसपास ही तुर्किस्तान की मरुभूमि है। यह मरुभूमि उस समय किस दशामें थी, यह कहना तो मुश्किल है; परन्तु इसकी दशा उस समय आज की-सी ही होगी, यह सन्देहात्मक है। सम्भवतः यह दशा बर्फ़ से गली चट्टानों के कारण हुई हो। चीनी भाषा में ’थियान’ का अर्थ स्वर्ग और ’शान’ का अर्थ पहाड़ है। हम उत्तर-कुरु के प्रदेशों का वर्णन महाभारत में या बौद्ध साहित्य में स्वर्ग का-सा पाते हैं। हम अल्टाई-पर्वत के नाम में भी संस्कृत की छाप पाते हैं। क्या यही थियानशान उत्तर-कुरु-प्रदेशों की उत्तरी सीमा हो सकती है ? क्या आर्य लोग थियानशान और पामीर के मध्यवर्ती मार्ग से दक्षिण-पूर्व की ओर नहीं बढ़ सकते थे ? क्या गोबी की मरुभूमि उस समय अच्छी दशा में नहीं हो सकती थी ? क्या मानसरोवर के उत्तरवर्ती या पश्चिमस्थ प्रदेश की भूमि कभी आर्यों की भूमि नहीं थी ? हमारा साहित्य तो भारत का हिमालयोत्तर-प्रदेश से सम्बन्ध होना बतलाता है। इसकी स्मृतियाँ, जहाँ देखिये वहीं प्रचुर मात्रा में पड़ी हुई हैं। ज़रूरत है उनका अध्ययन करने और भारतीय इतिहास पर नवीन प्रकाश डालने की।
    सोमरस और सुर-असुर का विभेद
    हमें मेरु पामीर को मानना हो चाहे थियानशान को, दोनों हालतों में हरिवर्ष यानी उत्तरकुरु को मानसरोवर के उत्तर होना मानना ही पड़ेगा। महाभारत, बौद्धसाहित्य, पुराण या रामायण-सबके अनुसार यह उत्तर-कुरु--जिसके मनुष्यों का वर्णन कुरु के निवासियों से यानी भारतीय आर्यों से कुछ विचित्र है और जो भारतीय आर्यों की प्रिय भूमि है, जिसका काल्पनिक स्मरण भी आज प्रत्येक आर्य को प्रफुल्लित किये देता है, जिसके आधार पर ही स्वर्ग की सारी कपना स्थित है--भारतवर्ष के उत्तर है। हिमालय आज भी आर्यसाहित्य की सृष्टि का प्रधान उत्तेजक है। यह कल्पना नहीं--पौराणिक-दन्तकथा नहीं--तथ्य है। हमारे सुर, हमारे इन्द्र, वरुण और कुबेर, यक्ष और गन्धर्व--सभी हिमालय के उत्तर हैं। मेरु के बाद हरिवर्ष, नैषध, किम्पुरुष, हेमकूट और भारतवर्ष की भूमि आर्यों की लीलाभूमि रही है। इसमें कवित्व नहीं, कोरा साहित्य नहीं, एक अचल ऐतिहासिक सत्य है। हम इस सिद्धान्त को तब और भी दृढ़ पाते हैं, जब हम सोमरस के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं। ऋग्वेद के सभी देवता सोमरस के मतवाले हैं; आर्यों के सभी यज्ञों में सोमरस की पग-पग पर आवश्यकता है। सोम-स्तुति पर ऋग्वेद का एक सम्पूर्ण मण्डल ही समर्पित है। अवेस्ता में भी इसका नाम है Haum, परन्तु इसकी वह महिमा नहीं, जो आर्यों के ऋग्वेद में है। अवेस्ता में सोमरस का पीनेवाला इन्द्र महज़ Demon हो जाता है और यहाँ इन्द्र आर्यों के एकमात्र उद्धारक बन जाते हैं। हमारे यहाँ सुरा की एक कथा प्रचलित है। यह सुरा सोमरस के सिवा और कुछ नहीं। पहले सुर और असुर दोनों आर्य ही थे; परन्तु जिन लोगों ने सुरा नहीं ग्रहण की, वे असुर और जिन्होंने ग्रहण की, वे सुर कहलाये। रामायण का यह श्लोक इसी प्रकार का है-

    सुराप्रतिग्रहाद्देवाः सुरा इत्यभिविश्रुताः। अप्रतिग्रहणात् तस्या दैतेयाश्चासुरास्तथा॥
    हम ऊपर दिति और अदिति का ज़िक्र कर चुके हैं। ये दैत्य असुर कहलाये और ’आर्यानां व्रजः’ से, जो कश्यप-सागर (Caspian Sea) से पूर्व-उत्तर और दक्षिण की ओर फैला हुआ है, दोनों अलग-अलग हो गये। अस्तु, हमें यह देखना है कि आर्यों को सोमरस इतना प्रिय क्यों हुआ ? सोमरस से आविष्ट हो इन्द्र दैत्यों और असुरों को परास्त करते हैं। हिमालयोत्तर-प्रदेश में, जो स्वभावतः ठण्ढा रहा होगा और है, सोमरस का पीना अस्वाभाविक नहीं। सोमरस के पत्थरों से पीसे जाने का वर्णन ऋग्वेद में बहुलता से मिलता है। सोमलता हिमालय की तराई या हिमालयोत्तर-प्रदेश-- ख़ासकर काराकोरम के आसपास अब भी पायी जाती है। यह सोम भारतीय आर्यों की अपनी सम्पत्ति है। अहुरों (असुरों) का इससे कोई सम्बन्ध नहीं। अवश्य ही सुर-दल को पहाड़ी प्रदेशों में आने के कारण कठिनाइयां झेलनी पड़ी हैं; परन्तु सोम उनके प्राणों का आधार है। यह पदार्थ, यह रस हिमालयोत्तर प्रदेश का ही स्मरण कराता है।
    आर्यों के आर्यावर्त में आने का समय, अर्जुन की विजय-यात्रा तथा महेन्जोदारो और हरप्पा की खोज
    यद्यपि इस लेख का विषय महेंजोदारो और हरप्पा से कुछ सम्बन्ध नहीं रखता, तथापि इन खोजों तथा इनके निर्णयों से हमें महाभारत के समय के निर्णय में बहुत सहायता मिलती है। महेंजोदारो में जिस सभ्यता का पता चला है, उसका समय ख्रीष्टाब्द से ३,२०० या ३,३०० वर्ष पूर्व निश्चित किया गया है। आज से ५,००० वर्ष पूर्व जब भारत के पश्चिमोत्तर-प्रदेश में एक ऐसी सभ्यता थी, जिसमें लोहा गलाना, ईंट के मकान बनवाना, नहर ख़ुदवाना, संगमरमर का काम करना, कला, शिल्प-ज्ञान और शीशे का प्रयोग प्रचलित था, उस समय भारत के अन्य भागों में भी ऐसी सभ्यता रही होगी जो इस सभ्यता से लाभ उठा सकती थी या इसे अपने अधिकार में रख सकती थी। इस १९२३ ई. के आविष्कार की जो सबसे बड़ी महत्ता है, वह यह है कि उस समय भारत में लिपि प्रचलित थी। इससे योरपीय पण्डितों का यह कहना कि भारतवासी ख्रीष्टाब्द से कुछ ही सौ वर्ष पहले लिखना नहीं जानते थे, बिलकुल असत्य और निराधार प्रमाणित हो जाता है। परन्तु एक बात, जो बहुत ही खटकती है, यह है कि यह सभ्यता आर्यों की नहीं, प्रत्युत अनार्यों की है। इस सिद्धान्त का आधार यह है कि यहाँ आविष्कृत पदार्थों में ऐसे चित्रफलक (Pictograms) और लिंग (Phallus) तथा पूर्ण (Complete) एवं अर्द्ध (Partial) समाधियां हैं जो आर्यों की कला से नहीं मिलतीं। ये पदार्थ मेसोपोटेमिया, मिश्र और क्रेट के तत्कालीन सम्बन्ध के द्योतक बताये जाते हैं। हिन्दू-युनिवर्सिटी के इतिहासाध्यापक श्री आर्. डी. बनर्जी, एम्.ए. इन चित्रफलकों और लिंगों को आर्यों के शिवलिंग या चित्रफलकों के अनुकरण पर बने होने में सन्देह करते हैं; क्योंकि इन लिंगों के साथ-साथ आर्य-प्रणाली के अनुसार अर्घ्यपट्ट या गौरीपट्ट नहीं है, अतएव यह बैबिलोनिया के लिंग का अनुकरण है, न कि शैवों के शिवलिंग का। इसके सिवा उस समय की अग्निपूजा की विधि आर्यों की अग्निपूजा की विधि से मिलती-जुलती नहीं है। उन्होंने आंशिक समाधि की तुलना--जिसमें शव को लोग मचान पर रख छोड़ते और अस्थि के अवशिष्ट रह जाने पर उसे किसी मिट्टी के बर्तन में रखकर गाड़ देते थे--आधुनिक छोटानागपुर के मुण्डों में प्रचलित आंशिक समाधि से की है। यहाँ पर प्राप्त खोपड़ियां भी मदरास के द्रविड़ों की शक्ल की पायी जाती हैं। महाभारत के विराट पर्व में पाण्डवों ने अपने अस्त्रों को, आंशिक समाधि के अनुकरण पर, कपड़े से छिपाकर रख छोड़ा था। यह अध्यापक बनर्जी महोदय ने भी लिखा है। इससे विदित होता है कि पाण्डव लोगों के समय में जंगली जातियों में ऐसा रिवाज रहा होगा। वैदिक साहित्य में इसका वर्णन या संकेत न मिलना कोई आश्चर्य नहीं। महाभारत का काल हिन्दू-प्रणाली के अनुसार ख्रीष्टाब्द से ३,००० वर्ष पहले समझा जाता है।
    यह समय इस महेंजोदारो के समय से मिल जाता है। महाभारत के समय भी जंगली जातियों का होना वर्णित है। यह हमें महाभारत-काल को आज से ५,००० वर्ष पूर्व हटाने में कोई अड़चन नहीं डाल सकता है। सच तो यह है कि मोहेंजोदारो के अनुसार हमें अपने इतिहास का प्रोग्राम ही बदलना पड़ेगा। हम पुराणों और महाकाव्यों का अध्ययन कर इस जटिल समय के प्रश्न को हल कर सकते हैं। इसके नये प्रकाश में हम इतिहास पर नया प्रकाश डाल सकते हैं। महाभारत कब लिखा गया तथा कब-कब इसकी काया में परिवर्द्धन होता गया, यह सोचने पर भी हम महाभारत के समय पर अविश्वास नहीं कर सकते। गर्गसंहिता के ’युगपुराण’ पर विश्वास कर, जैस कि ऊपर बतला चुके हैं, महाभारत से आजतक अर्थात् ३,००० ख्री.पू. से बीसवीं शताब्दी तक के गौरवपूर्वक दृष्टिपात कर सकते हैं। ईश्वर जाने, यह सुयोग हमें कब मिलेगा; परन्तु यह देखकर संतोष होता है कि इन दिनों क्या योरपीय और क्या भारतीय विद्वान् पुराणों के अध्ययन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अस्तु, वह दिन बहुत दूर नहीं है जब आर्यों का पूर्ण इतिहास हमारे साहित्य में मिल जाय।
    लेख बहुत बढ़ गया, परन्तु उपसंहार में कुछ कह देना आवश्यक होने के कारण यही कहना अलम् है कि ऋग्वेद और अवेस्ता के अध्ययन के बाद पौराणिक तथा बौद्ध साहित्य के अध्ययन करने पर हमें हिमालयोत्तर-प्रदेशों का सच्चा ऐतिहासिक परिचय मिल सकता है। यदि हम भारतीय आर्यों के हिमालय की ओर से एक बार नहीं, समय-समय पर कई मार्गों से भारत में आने की विचार-दृष्टि से वेदों और अन्य संस्कृत-साहित्यों का अनुशीलन करें तो उसकी व्याख्या अत्यन्त सरल, सुबोध और ऐतिहासिक बन जाय। आशा है, भारतीय इतिहास के प्रेमी विद्वान् और विद्यार्थी लोकमान्य तिलक की बतायी सरिणी पर अग्रसर हो, अपने इतिहास का जीर्णोद्धार कर हमारे अन्धकार को दूर करेंगे। एक बात और, योरपीय विद्वानों ने स्वार्थ बुद्धि से प्रेरित हो जिस प्रकार हमारे गौरवपूर्ण इतिहास को एक तुच्छ तथा हेय रूप देना प्रारम्भ किया था, उससे शायद छुटकारा मिलने में अभी बहुत विलम्ब है। हमारी आँखों पर अपना इतिहास देखने के लिये भी योरपीय चश्मा लगाने की आवश्यकता पड़ती है। इससे बढ़कर शर्म की बात और क्या हो सकती है कि आर्यों के एकमात्र प्रामाणिक इतिहास पुराण, बौद्ध-साहित्य तथा अन्यान्य साहित्य पर हम अविश्वास करें एवं भारतीय इतिहास की जानकारी के लिये दर-दर की ख़ाक छानते फिरें। पुराणों में आर्यों का भौगोलिक ज्ञान भरा पड़ा है। इनमें वर्णित स्थानों का पता हम तभी लगा सकते हैं जब यह पूर्णतः समझ लें कि आर्यों की सभ्यता उस समय, जब यह भूगोल लिखा गया, उन देशों तक फैल गयी थी। चक्रवर्तित्व प्राप्त करने के लिये भारतीय राजाओं का देश-देशान्तर जाकर राजाओं को पराजित करना एक परम्परा की बात थी। अर्जुन का दिग्विजय के लिये हिमालयोत्तर-प्रदेशों में जाना महाभारतकार की कपोल-कल्पना नहीं, एक अक्षुण्ण सत्य है। सच तो यह है कि भारतीय आर्य--चाहे वे भारत के आदिम-निवासी रहे हों और अन्य आर्य यहीं से अन्यत्र संसार में फैले हों, जैसा कि कई विद्वानों की धारणा है, चाहे वे तिलक के कथनानुसार उत्तरीय ध्रुव से आते-आते अन्त में भारत पहुँचे हों--भूगोल की पूर्ण जानकारी रखते थे। उस भूगोल और इतिहास पर अविश्वास करना प्राचीन आर्य ऋषियों के प्रति महा अपराध करना है। अभी यह नहीं कहा जा सकता कि आर्यों की आदि-भूमि कौन-सी है। प्रत्येक भारतीय की यह नैसर्गिक धारणा है कि भारत ही आर्यों की सृष्टि-सनातन क्रीड़ा-स्थली है। जो कुछ सत्य साबित हो, अभी तो हमें योरपीय विद्वानों के मायाजाल के फन्दे से निकलकर स्वतन्त्र रूप से अपने प्राचीन इतिहास का पता लगाना है। हमारे पढ़ने के लिये रक्खा गया आज का इतिहास तो प्रहसन या उपन्यास ही कहा जा सकता है। आर्यावर्त से लेकर हरिवर्ष तक का इतिहास हमारे प्राचीन आरण्यक या पौराणिक साहित्य ही बता सकते हैं। ईश्वर करे, हम इसके लिये कटिबद्ध हो अपने साहित्य के अवगाहन में लग जायँ। क्या प्रत्येक आर्य-सन्तान को इस सभ्यता की आदि-जननी, कुतूहल-मयी, विशुद्ध आर्य-गाथा के जानने की लालसा नहीं होती ?
    अर्जुन की विजय-यात्रा को सत्य मानने तथा पुराण में दिये हुए भौगोलिक नामों की आधुनिक नामों से तुलना करने पर यह कहना पड़ता है कि महाभारत के समय में अर्थात् आज से ५,००० वर्ष पूर्व भारतीय आर्यों को हरिवर्ष तक अर्थात् थियानशान (Celestial Mountain) पर्वत के आसन्नवर्त्ती हिमालयोत्तर-प्रदेशों तक का पूर्ण ज्ञान था। इसी हरिवर्ष को उस समय आर्य लोग उत्तर-कुरु कहते थे तथा आर्यावर्त के ’कुरु’ को उसी उत्तर-कुरु की स्मृति-रक्षा के लिय बसाया। मध्य-एशिया के ’आर्यानां व्रजः’ का अर्थ आर्यावर्त से मिलता है। कोरासागर से (उत्तर-सागर) जो Arctic Circle में है आरंभ कर आर्य लोग सीधे उत्तर की ओर पुराण निर्दिष्ट मार्ग से आये, इसमें सन्देह नहीं है। यूराल-नदी और ऐरल-सागर से ’इर्’ धातु का निर्विवाद और घनिष्ट सम्बन्ध है। ’इर्’ से ही ऐरावत बना है। इसका सम्यक् विवेचन एक-एक कर पहले किया जा चुका है। ऐरल-सागर के पश्चिम की ओर एलबर्ज़ (इलावृत) है। इरास्य, इलास्पद या इरास्पद की मैंने योरप से तुलना की है। ऐरल-सागर से (उक्ष) नदी निकलती है। इसी नदी के दोनों तरफ़ आर्य लोग कुछ काल तक रहे और यहीं से (इलावृत और उक्ष के मध्यवर्ती देश से) आर्य और ईरानी अलग हुए। ईरानियों का मार्ग तभी से बदल गया और भारतीय आर्यों का थियानशान, पामीर, मानसरोवर, तारीम (भद्राश्व) आदि से होकर काश्मीर या हिन्दुकुश के मार्ग से आना हुआ। सिन्ध में आ जाने पर ईरानी शाखा से सीमाप्रान्त पर भेंट हुई; क्योंकि वे भी अब तक काबुल पहुँच गये थे। भारतीय आर्यों का उत्तर-ध्रुव से लेकर आर्यावर्त तक का सीधा वर्णन यही बतलाता है। मानसरोवर और हिमालय ही उनका एकमात्र आदर्श है। काबुल के मार्ग से वे अभी नहीं आये, बल्कि भारत में पदार्पण के बाद वे काबुल की ओर भी फैले। किस समय वे भारत में आये, इसका निर्णय करना नितान्त दुष्कर है। कम-से-कम ५,००० वर्ष पूर्व तो महाभारत का समय है, जिस समय आर्य बहुत पुराने पड़ गये थे। ऋग्वेद की ऋचायें सिन्धु और सरस्वती के किनारे भी रची गयीं। लोकमान्य के सिद्धान्त की पुष्टि पौराणिक भूगोल से पूर्णतः होती है। यह धारणा कि आर्य आदि से भारत में रहे--सत्य या असत्य है यह अभी नहीं कहा जा सकता। परन्तु इतना तो निश्चित है कि भारतीय ऋषियों का जो समय-निरूपण अब-तक माना जा रहा है, वह सत्य सिद्ध होगा। और, ऐसा होने पर महाभारत से हज़ारों वर्ष पूर्व आर्यावर्त में आर्यों का बसना सिद्ध होगा। कम-से-कम इस समय यह सिद्ध करने का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता कि भारत से ही आर्य लोग अन्यत्र फैले। देवताओं के एक दिन-रात (जो मनुष्यों के एक वर्ष के तुल्य है) के प्रमाण से उत्तर-ध्रुव में उनका रहना स्पष्ट है। अतएव यदि आर्यों का आधिपत्य उत्तर-ध्रुव से आर्यावर्त तक यानी प्राचीन आर्यावर्त से अर्वाचीन आर्यावर्त तक माना जाय, तो कोई दुःख की बात नहीं, प्रत्युत हर्ष की बात है। फिर यदि आर्य ही पहले-पहल भारतवर्ष में आये तब तो उनका आधिपत्य स्वाभाविक और न्याय-सिद्ध है। ईश्वर करे, हमारा इतिहास हमारे सामने आ जाय।......

    आदर्श राज्यके सर्व गुण धर्माधिष्ठित हिंदुराष्ट्रमें होंगे !


    रामराज्य
    १. रामराज्यमें दुःखी विधवा स्त्रियां अथवा अनाश्रमी न होना
    २. रामराज्यमें लोकतंत्रके अनुसार प्रत्येकको ‘मत’ देनेका, अर्थात राजा  चुननेका अधिकार नहीं था; किंतु प्रत्येकको ‘मत’ अमान्य करनेका अधिकार था ।  इसका अर्थ है कि प्रत्येकको राजासे भी अधिक अधिकार था । ‘धोबीकी पत्नी क्या  करे, क्या न करे’, इसमें श्रीरामका हस्तक्षेप नहीं था; किंतु ‘श्रीरामकी  पत्नी कैसा आचरण करे’, यह कहनेका अधिकार साधारणसे धोबीको था । इसीलिए उसके  कहनेपर श्रीरामने अपने प्राणोंसे भी प्रिय पत्नी सीताका त्याग किया ।  रामराज्यमें समताका लाभ प्रजा ले रही थी, तो विषमताका दुःख श्रीराम भोग रहे  थे ।’ - डॉ. वसंत बाळाजी आठवले (ई.स. १९९०)

    रामराज्यकी आदर्श प्रजा
    ‘राम वनवासके लिए निकले । उस समय रामराज्यके शोकाकुल नागरिक रामका रथ नहीं  रोक सके । उस रात्रि अयोध्याके किसी घरमें न तो दिया जला, न अग्नि प्रदीप्त  हुई और न भोजन ही बना । जलविहीन सागरसमान अयोध्या निर्जन / उदास हो गई ।’  -गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (घनगर्जित, जून २००६) राज्यमें वेश्याएं नहीं  थीं; कारण, वेश्याके पास जानेवाले लोग ही नहीं थे । राज्यमें चोर न होनेके  कारण पुलिस भी नहीं थी । अपराध न होनेके कारण न्यायालय नहीं थे । सर्वजन  धर्मनियमोंका पालन करते थे ।

    ऐसा होगा सर्वगुणसंपन्न धर्माधिष्ठित हिंदुराष्ट्र !

    १. शासनकी दृष्टिसे हिंदुराष्ट्र !
     १.१ शासक : शासक, धर्मपालक, सात्त्विक, नीतिमान, जनकल्याणकारी,  निःस्वार्थी एवं जनतासे पितासमान प्रेम करनेवाले होंगे ! वे जनतासे  धर्माचरण करवानेवाले, संतोंका मार्गदर्शन लेनेवाले, पारदर्शी कार्यव्यापार  करनेवाले तथा न्यायप्रियता, नियोजनबद्धता, अनुशासनप्रियता, निर्णयक्षमता,  सतर्कता  आदि प्रशासकीय दृष्टिसे महत्त्वपूर्ण गुणोंसे युक्त होंगे ।

    १.२ राज्यका संविधान : ‘लोकतंत्रमें संविधानकी आवश्यकता होती है, तो  धर्माधिष्ठित हिंदुराष्ट्रमें धर्म ही नीति-नियमोंका मूल होनेसे राज्यको  संविधानकी आवश्यकता नहीं होगी !’ – अधिवक्ता रामदास केसरकर, सनातन संस्थाके  मानद विधि-परामर्शदाता

    १.३ चुनाव : मतकोष, आरक्षित स्थान, हिंसाचार, ५० प्रतिशतसे अधिक  लोगोंद्वारा नकारे जानेपर भी, सर्वाधिक मत मिलनेके कारण प्रत्याशियोंका  जीतना आदि त्रुटिपूर्ण चुनाव हिंदुराष्ट्रमें नहीं होंगे । पात्र जनता  पात्र और योग्य नागरिकको राज्यकार्यव्यापार करनेके लिए कहेगी ।

    १.४ राज्यका कार्यव्यापार : राज्यका कारभारसंबंधी निर्णय बहुमतके बलपर नहीं, अपितु योग्य और आवश्यक तत्त्वोंका विचार कर लिया जाएगा । उसमें पारदर्शकता होगी ।

    २. न्यायकी दृष्टिसे हिंदुराष्ट्र !
    २.१ न्यायदान : न्यायाधीश सूक्ष्म आयामके जानकार होंगे, इसलिए  अन्यायग्रस्तोंको योग्य और तुरंत न्याय मिलेगा ! इस कारण, न्यायप्रणालीमें  अधिवक्ताओंकी आवश्यकता नहीं होगी । हिंदुराष्ट्रमें लोकतंत्रकी भांति  ‘कानूनका राज्य’ (कोर्ट ऑफ लॉ) नहीं; अपितु ‘न्यायका राज्य’ (कोर्ट ऑफ जस्टिस) होगा ।

    २.२ कानून : सर्व कानून हिंदुहितमें होंगे । धर्मांतरण, विधिद्वारा  प्रतिबंधित होगा । इस कारण, किसीको फंसाकर धर्मांतरित नहीं किया जा सकेगा ।  गोवंशहत्याबंदी कानून होगा । अल्पसंख्यकोंका
    तुष्टीकरण नहीं होगा । सर्व नागरिकोंके लिए ‘समान नागरी कानून’ होगा !

    ३. प्रशासकीय दृष्टिसे हिंदुराष्ट्र !
    ३.१ आरक्षक (पुलिस) एवं प्रशासन : हिंदुराष्ट्रमें शासन, प्रशासन, सुरक्षा बल और न्यायालयोंमें केवल राष्ट्र  एवं धर्मप्रेमी होंगे ।

    ३.२ आरक्षणमुक्त पदोन्नति : हिंदुराष्ट्रमें आरक्षण नहीं होगा ।  वर्तमान लोकतंत्रमें जाति अथवा धर्मके आधारपर लोगोंको दी गई सर्व नौकरियां,  उनमें योग्यता होनेपर ही हिंदुराष्ट्रमें पूर्ववत जारी रहेंगी अन्यथा उन  नियुक्तियोंको निरस्त कर दिया जाएगा ! अधिकारियोंको उनकी योग्यताके अनुसार,  अर्थात लगन, भाव, प्रीति, नेतृत्वगुण एवं अहंभाव अल्प इत्यादि गुणोंके  आधारपर ही बढोत्तरी मिलेगी ।

    ४. संरक्षणकी दृष्टिसे हिंदुराष्ट्र !
    ४.१ सीमा : हिंदुराष्ट्रमें देशकी सर्व सीमा सर्वप्रथम सुरक्षित की जाएंगी । घुसपैठपर अंकुश लगानेके लिए कठोर कानून बनाए जाएंगे ।

    ४.२ संरक्षण : देशकी अंतर्बाह्य सुरक्षाको प्रथम वरीयता होगी ।  आतंकवादी (बाह्य) और नक्सलवादी (अंतर्गत) शत्रुओंका निर्मूलन किया जाएगा ।  इस कारण प्रजा सुरक्षित जीवन यापन कर सकेगी !

    ५. आर्थिक दृष्टिसे हिंदुराष्ट्र !
    वर्तमानमें अर्थशास्त्रकी पश्चिमी व्याख्या, ‘आवश्यकता अमर्यादित और  आपूर्ति मर्यादित, इनमें सामंजस्य स्थापित करनेवाला शास्त्र’ है । इस  व्याख्यामें सर्वजनोंकी आवश्यकताओंकी पूर्ति होती नहीं दिखाई देती ।  हिंदुराष्ट्रके अर्थशास्त्रानुसार सर्वजनोंको आवश्यकतानुसार सब मिलेगा,  अर्थात सर्वजन सुखी होंगे । संक्षेपमें, हिंदुराष्ट्रमें अर्थशास्त्र  कौटिल्यके अर्थशास्त्रपर आधारित ‘सर्वे संतु निरामयः’, यह वचन सार्थक  करनेवाला होगा । कालाधन और भ्रष्टाचार न होनेके कारण और जनता उद्यमशील  वृत्तिकी होनेके कारण देशकी अर्थव्यवस्था उत्तम होगी । उसमें देशवासियोंका  पैसा उन्हींके कल्याणके लिए व्यय किया जाएगा । भाववृद्धि और शेअर बाजार  जैसे जुएके अड्डे भी हिंदुराष्ट्रमें नहीं होंगे । राष्ट्रीय प्रगतिके लिए  आवश्यक उतना ही कर उगाहनेवाली कौटिल्यकी अर्थनीतिपर
    आधारित करव्यवस्था हिंदुराष्ट्रमें होगी ।

    ५.१ उद्योगीकरण : ‘उद्योगीकरणके कारण नागरिकोंकी सादी जीवनशैली नष्ट  होकर भोग-विलास आवश्यक लगने लगता है । इस कारण भोगवाद बढता है ।  हिंदुराष्ट्र धर्माधिष्ठित होनेके कारण वह उद्योगीकरणको नियंत्रित रखेगा और  योग्य दिशा भी देगा । हिंदु धर्मने विशिष्ट आयुके पश्चात व्यक्तिको  निवृत्तिका मार्ग बताया है । इस निवृत्तिमार्गके कारण सांसारिक उपभोग सीमित  होकर उससे संबंधित वस्तुओंके उत्पादनपर अपनेआप ही अंकुश लगेगा ।

    ५.२ उत्पादन : हिंदुराष्ट्रमें स्वदेशी अस्मिताका पोषण किया जाएगा ।  नागरिक स्वदेशी वस्तु ही क्रय करेंगे । भौतिक सुखवाद नहीं; अपितु  धर्मानुकूल हिंदु जीवनपद्धति वेंâद्रबिंदु होगी । इससे सुखवादी उत्पादनोंको  प्रोत्साहन नहीं मिलेगा ।

    ५.३ कृषि : सात्त्विक, राष्ट्रीय आवश्यकताएं पूर्ण करनेवाले और राष्ट्रीय प्रगतिके लिए पोषक अन्न ही कृषक बोएंगे । भारतको अन्न-धन और मूलभूत आवश्यकताओंके संबंधमें स्वयंपूर्ण बनाना, यह कृषि
    विभागका ध्येय होगा ।

    ५.४ उपजीविका : लोग बाहुबल और ज्ञानके द्वारा द्रव्यार्जन करेंगे ।  नागरिकोंकी कार्यक्षमता बढेगी, इस कारण श्रमशक्ति एवं ज्ञानशक्ति वृद्धिंगत  होगी । जनता कृपण नहीं; अपितु मितव्ययी होगी ।

    ६. शैक्षणिक दृष्टिसे हिंदुराष्ट्र !
    ६.१ शिक्षण : मैकॉलेप्रणीत शिक्षणपद्धति हटाकर, आदर्श गुरुकुल पद्धति  अस्तित्वमें लाई जाएगी । इस शिक्षणपद्धतिके कारण विद्यार्थी आत्मनिर्भर,  ज्ञानी, स्वाभिमानी, राष्ट्रप्रेमी तथा आत्मबल और क्षात्रतेजसे संपन्न  होंगे ।

    ६.२ धर्मशिक्षण : विद्यालयस्तरसे ही धर्मशिक्षण दिए जानेसे भावी पीढी  संस्कारित एवं नीतिमान होगी । हिंदु धर्मग्रंथोंकी सीख देनेवाले  ‘विद्यालयों’की स्थापना की जाएगी । गुरु-शिष्य-परंपरा पुनरुज्जीवित की  जाएगी ।

    ६.३ अध्यात्म विश्वविद्यालय : अध्यात्ममें प्रगति करनेकी इच्छा  रखनेवालोंके लिए ‘अध्यात्म विश्वविद्यालयों’की स्थापना की जाएगी । इस  विद्यालयसे उत्तीर्ण होकर बाहर जानेवाले विद्यार्थी संत ही होंगे ।

    ६.४ इतिहास : भारतके प्राचीन गौरवशाली इतिहासका पुनर्लेखन कर  हिंदुओंका सत्य और राष्ट्रभक्तियुक्त क्षात्रवृत्ति जागृत करनोवाला इतिहास  विद्यालयोंमें सिखाया जाएगा । हिंदुओंके तेजस्वी इतिहासका प्रमाण देनेवाली  ऐतिहासिक वस्तुओं और वास्तुको संजोया जाएगा ।

    ६.५ विज्ञान : ‘विज्ञानके लिए विज्ञान’, वैज्ञानिक शोधका यह स्वरूप न रहकर, वह मानवजातिके लिए पूरक होगा । विज्ञानकी सीमाएं भी बताई जाएंगी ।

    ६.६ कला : ‘मात्र कलाके लिए कला’ नहीं; अपितु ‘ईश्वरप्राप्तिके लिए कला’, इस दृष्टिसे कलाका विकास किया जाएगा ।

    ७. सांस्कृतिक दृष्टिसे हिंदुराष्ट्र !
    ७.१ मनोरंजन : संगीत, दूरदर्शन, क्रीडा, यात्रा, वर्तमानपत्र, ये  केवल मनोरंजनके साधन नहीं होंगे; अपितु इनके माध्यमसे समाज एवं राष्ट्रकी  प्रगतिके लिए पोषक, वैचारिक विकासकी ओर ध्यान दिया जाएगा ।

    ७.२ सार्वजनिक स्थानोंके नाम और पुतले : ‘मार्गोंको, विविध  प्रतिष्ठानोंको दिए गए राजनेताओंके नाम, उनके खडे किए गए पुतले तथा केवल  १-२ पीढियों तक ही ज्ञात नामोंके रास्ते, पुतले इत्यादि हिंदुराष्ट्रमें  नहीं होंगे । उनके स्थानपर देवता, संत, ऋषिमुनि, कालिदास समान अभिजात  लेखकोंके नाम मार्गोंको दिए जाएंगे ।

    ७.३ राष्ट्रीय दिवस : हिंदुराष्ट्रमें प्रत्येक दिवस आध्यात्मिक  लाभकी दृष्टिसे मनाया जाएगा, उदा. ‘शिक्षकदिवस’ गुरुपूर्णिमापर,  ‘आरोग्यदिवस’ धन्वंतरी जयंतीपर, ‘कलादिवस’ महाशिवरात्रिपर (नृत्य और
    संगीत शिवसे उत्पन्न हुए ।), तो ‘न्यायदिवस’ यमद्वितीयापर ।

    ८. धार्मिक दृष्टिसे हिंदुराष्ट्र !
    ८.१ देवालय : देवालयोंके न्यासी और सेवाधारी भक्त होंगे तथा  देवनिधिका उपयोग धर्मकार्यके लिए ही होगा ! देवताओंके उत्सवमेलोंसे  श्रद्धालुओंको आध्यात्मिक लाभ होनेके लिए उत्सवमेलोंकी गुणवत्ता सुधारी  जाएगी ।

    ८.२ देवताओंकी मूर्ति : देवालयोंमें देवताओंकी मूर्तियां संबंधित  देवताके अधिकाधिक तत्त्व और सात्त्विकता प्रक्षेपित करनेवाली होंगी । इस  कारण, श्रद्धालुओंकी भावजागृति सहजतासे होगी ।

    हिंदुओ, अपेक्षित हिंदुराष्ट्र वास्तवमें साकार होनेके लिए प्रतिज्ञा करें !  रामराज्यकी प्रजा धर्माचरणी थी । इसीलिए उसे श्रीराम समान सात्त्विक राजा  शासकके रूपमें मिला । हम भी धर्माचरणी बनें, तो इस कलियुगमें भी रामराज्य,  अर्थात धर्माधिष्ठित हिंदुराष्ट्र अवतरित होगा !....